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भारत में बाघों की गणना 2026 जारी, दुनिया का सबसे बड़ा वन्यजीव सर्वेक्षण

इशा राव इशा राव isharao.avalw.com · 166 reads Respect0 Save Share Read only
READS8live count PUBLISHED16 Sept2026 READING TIME4 min749 words LANGUAGEHindi
AI CITATIONS? Gathering data

भारत में बाघों की अखिल भारतीय गणना 2026 चल रही है, जो दुनिया का सबसे बड़ा वन्यजीव सर्वेक्षण है। शुरुआती अनुमानों के अनुसार बाघों की संख्या बढ़ने की उम्मीद है, हालांकि उनके लिए जगह की कमी एक बड़ी चिंता बनी हुई है।

चार साल में एक बार होने वाली गणना

बाघों की यह गणना हर चार साल में एक बार की जाती है, और मौजूदा सर्वेक्षण इसका छठा चक्र है। इसकी शुरुआत साल 2025 के अंत में हुई और यह काम 2026 के दौरान जारी रहेगा। इतने बड़े पैमाने पर एकत्र किए गए आंकड़ों का विश्लेषण करने में समय लगता है, इसलिए इसकी अंतिम रिपोर्ट के साल 2027 के मध्य तक आने की उम्मीद है।

पिछली गणना साल 2022 में हुई थी, जिसमें देश में 3,682 बाघ दर्ज किए गए थे। यह आंकड़ा अपने आप में बेहद अहम है, क्योंकि दुनिया के कुल जंगली बाघों में से 75 प्रतिशत से अधिक अकेले भारत में रहते हैं। ऐसे में भारत की यह गणना केवल एक देश का नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के बाघ संरक्षण का एक बड़ा पैमाना बन जाती है।

घने जंगल किसी एक प्रजाति के नहीं, बल्कि असंख्य जीवों के घर होते हैं। बाघ के संरक्षण से पूरे वन तंत्र को लाभ मिलता है।
घने जंगल किसी एक प्रजाति के नहीं, बल्कि असंख्य जीवों के घर होते हैं। बाघ के संरक्षण से पूरे वन तंत्र को लाभ मिलता है।

कैसे होती है इतनी बड़ी गिनती

इतने विशाल सर्वेक्षण को तीन चरणों में पूरा किया जाता है। पहले चरण में वन रक्षक पैदल चलकर तय रास्तों पर बाघों और अन्य वन्यजीवों के निशान, पगमार्क और अन्य संकेत दर्ज करते हैं। यह ज़मीनी काम पूरे सर्वेक्षण की नींव तैयार करता है, क्योंकि जंगल की असली तस्वीर वहीं से सामने आती है।

दूसरे चरण में उपग्रह से ली गई तस्वीरों और रिमोट सेंसिंग की मदद से जंगल के नक्शे और आवास का अध्ययन किया जाता है। तीसरे और सबसे अहम चरण में जंगल में 40 हज़ार से अधिक कैमरा ट्रैप लगाए जाते हैं। इन्हें एक ग्रिड प्रणाली के तहत लगाया जाता है, जिसमें हर चार वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में दो गति-संवेदी कैमरे रखे जाते हैं।

इन कैमरों में कैद हुई तस्वीरों का विश्लेषण एक विशेष सॉफ्टवेयर की मदद से किया जाता है, जो हर बाघ की धारियों के अनूठे पैटर्न को पहचान लेता है। हर बाघ की धारियां इंसान की उंगलियों के निशान की तरह अलग होती हैं, इसलिए इनकी मदद से एक-एक बाघ की अलग पहचान की जाती है। यह सटीकता ही इस विशाल सर्वेक्षण की सबसे बड़ी ताकत है।

इस पूरे अभियान का दायरा बेहद बड़ा है। यह सर्वेक्षण 20 से अधिक राज्यों में फैले चार लाख वर्ग किलोमीटर से भी ज़्यादा क्षेत्र को समेटता है। इसमें 60 हज़ार से अधिक वन कर्मचारी शामिल होते हैं, जो कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में महीनों तक काम करते हैं। यही वजह है कि इसे दुनिया का सबसे बड़ा वन्यजीव सर्वेक्षण कहा जाता है।

बढ़ती संख्या, घटती जगह

शुरुआती अनुमानों और रिपोर्टों के अनुसार, इस बार बाघों की संख्या में करीब 10 से 15 प्रतिशत तक की वृद्धि देखी जा सकती है। यह एक सुखद संकेत है और दशकों से चल रहे संरक्षण प्रयासों की सफलता को दर्शाता है। हालांकि इस अच्छी खबर के साथ एक गंभीर चिंता भी जुड़ी हुई है, जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

रिपोर्टों के मुताबिक बाघों की बढ़ती संख्या का बड़ा हिस्सा अभयारण्यों के मुख्य क्षेत्रों के बाहर देखा जा रहा है, यानी बफर ज़ोन, आसपास के वन क्षेत्रों और बाघ गलियारों में। इसका सीधा अर्थ है कि बाघों के लिए जगह कम पड़ती जा रही है। जब बाघ अपने पारंपरिक इलाकों से बाहर निकलते हैं, तो इंसानों के साथ उनका आमना-सामना बढ़ने का खतरा भी पैदा होता है।

बाघ अभयारण्य और संरक्षण

बाघों को सुरक्षित आवास देने के लिए देश में अभयारण्यों का जाल लगातार बढ़ाया जा रहा है। अप्रैल 2026 तक भारत में बाघ अभयारण्यों की संख्या बढ़कर 58 हो गई है, जिनमें मध्य प्रदेश का माधव बाघ अभयारण्य हाल ही में जोड़ा गया है। हर नया अभयारण्य बाघों को फैलने और बढ़ने के लिए अतिरिक्त सुरक्षित जगह उपलब्ध कराता है।

सरकार ने बाघ संरक्षण को लेकर एक दूरगामी सोच भी सामने रखी है, जिसे टाइगर एट 2047 नाम दिया गया है। इसका मकसद देश के हर संभावित बाघ क्षेत्र को सुरक्षित करना है, ताकि आने वाले दशकों में भी बाघों की आबादी फलती-फूलती रहे। यह योजना केवल गिनती बढ़ाने की नहीं, बल्कि दीर्घकालिक रूप से आवास बचाने की है।

जलवायु और आगे की चुनौतियां

बाघों के भविष्य पर जलवायु परिवर्तन का असर भी गहराता जा रहा है। बदलता मौसम जंगलों की सेहत, पानी के स्रोतों और बाघों के शिकार यानी उनके भोजन की उपलब्धता को प्रभावित करता है। अभयारण्यों के भीतर यह बदलाव धीरे-धीरे पूरे खाद्य तंत्र को छूता है, जिससे संरक्षण का काम और जटिल हो जाता है।

गणना की अंतिम रिपोर्ट 2027 में आएगी, लेकिन अभी से मिल रहे संकेत भारत के बाघ संरक्षण की दोहरी तस्वीर पेश करते हैं। एक ओर बढ़ती संख्या दशकों की मेहनत की कामयाबी है, तो दूसरी ओर घटती जगह और जलवायु की चुनौतियां आगे की राह कठिन बनाती हैं। बाघ को बचाना दरअसल पूरे जंगल और उस पर निर्भर असंख्य जीवों को बचाने जैसा है, और यही इस विशाल गिनती का असली संदेश है।

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इशा राव 2026-09-16 · 4 min read · 8 reads
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