भारत में विदेशी पालतू जानवरों की बिक्री का बढ़ता प्रवाह और इससे जल निकायों पर पड़ रहा गंभीर प्रभाव।
पहचान और विपत्ति
पानी में तैरते हुए एक छोटे से कछुए के सिर के पीछे जो लाल धब्बा दिखता है, वही उसकी सबसे बड़ी पहचान और सबसे बड़ी विपत्ति है। यह रेड ईस्ड स्लाइडर, जो उत्तर अमेरिका के मिसिसिपी नदी घाटी का मूल निवासी है, आज भारत के कई राज्यों के जलाशयों में एक अतिरिक्त प्रजाति के रूप में फैल चुका है।
हाल ही में जारी रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय अधिकारियों ने कुल 12,385 कछुओं को जब्त किया है। यह संख्या बस एक आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह एक चेतावनी है कि हमारी पारंपरिक पानी की निकाय अब विदेशी प्रजातियों के लिए एक अनचाहा घर बन रहे हैं।
यह लाल धब्बा जो कछुए की आँख के पीछे स्पष्ट रूप से दिखाई देता है, उसे दुनियाभर में पहचानने के लिए पर्याप्त है। लेकिन इसी पहचान के कारण यह प्रजाति भारत में भी तेजी से फैल रही है। जब्त किए गए 12,385 कछुओं का आंकड़ा दर्शाता है कि यह समस्या कितनी गंभीर हो चुकी है और स्थानीय पारिस्थितिकी प्रणाली पर कितना दबाव पड़ रहा है।
खिलौने से बदलता हुआ पानी
जब कोई व्यक्ति एक छोटा सा, क्यूट कछुआ खरीदता है, तो उसे लगता है कि यह घर का एक निरपेक्ष सदस्य है। लेकिन जैसे ही यह जानवर बड़ा होता है, पालन की जिम्मेदारी भारी हो जाती है।
सोशल मीडिया पर ट्रेंडिंग होने के कारण लोग इन जानवरों को खरीदते हैं, लेकिन जब वे बड़े होकर परेशान करने लगते हैं, तो उन्हें अक्सर खुले पानी के निकायों में छोड़ दिया जाता है। यही वजह है कि आज गुजरात, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल, पंजाब, राजस्थान, गोवा और तेलंगाना में इनका पता चलता है।
गृहस्थी में एक छोटे से कछुए को पालना शुरू में आसान लगता है, लेकिन समय के साथ इसकी ज़रूरतें बढ़ जाती हैं। जब मालिकों को पालन की जिम्मेदारी से परेशानी होती है, तो वे उसे नदी या तालाब में छोड़ देते हैं। इसी गलतफहमी के चलते गुजरात, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल, पंजाब, राजस्थान, गोवा और तेलंगाना जैसे विभिन्न राज्यों में इन विदेशी कछुओं की उपस्थिति दर्ज की गई है।

इकोसिस्टम पर गहरा असर
हिमन वर्ल्ड फॉर एनिमल्स के भारत निदेशक सुमान्त बिनदुमाधव का कहना है कि ये कछुए पानी में बहुत ही आक्रामक हो जाते हैं। वे अन्य स्थानीय जीवों को खा लेते हैं और स्वयं को पानी का प्रभु बना देते हैं।
यह केवल एक प्रजाति का प्रभाव नहीं है, बल्कि यह पूरे पारिस्थितिक संतुलन को उलट देता है। जब एक विदेशी प्रजाति स्थानीय प्रजातियों को खत्म कर देती है, तो उस जलाशय की जैव विविधता को गहरा झटका लगता है।
सुमान्त बिनदुमाधव के अनुसार, इन कछुओं की आक्रामकता स्थानीय मछलियों और छोटे जलीय जीवों के लिए घातक होती है। वे अपने आप को जलाशय का प्रभु साबित करते हैं और संतुलन बिगाड़ देते हैं। इससे न केवल एक प्रजाति प्रभावित होती है, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र की जैव विविधता पर गहरा और दीर्घकालिक असर पड़ता है, जिससे स्थानीय पर्यावरण नष्ट हो जाता है।

नियमों की कमी और जनसंख्या का आंकड़ा
साल 2020 में भारत सरकार ने एक स्वयंसेवी प्रकटन योजना शुरू की थी, जिसमें 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 40,000 से अधिक लोगों ने अपने विदेशी पालतू जानवरों की जानकारी दी थी।
हालाँकि, इसी संगठन के अनुसार यह संख्या वास्तविक आंकड़े से बहुत कम है। अत्यधिक पालतू जानवरों की खरीदारी ने भारत में एक बड़ा उद्योग बना दिया है, जहाँ नियमों की कमी और लोगों की अनजानगी मिलकर एक विनाशकारी संयोजन बना रही है।
सरकार की 2020 में शुरू की गई स्वयंसेवी प्रकटन योजना के तहत 40,000 से अधिक लोगों ने 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में विदेशी पालतू जानवरों की जानकारी दी। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह आंकड़ा वास्तविक संख्या से बहुत कम है। इससे पता चलता है कि नियमों की कमी और लोगों की अनजानगी के कारण एक बड़ा और अनियंत्रित उद्योग उभर रहा है, जो पर्यावरण के लिए खतरनाक है।

सोशल मीडिया की भूमिका
अनुसंधानकर्ता उतारा मंदिराट्टा बताती हैं कि लोग अक्सर उन जानवरों को खरीदते हैं जिन्हें दुर्लभ या शीतल माना जाता है। सोशल मीडिया का प्रभाव यहाँ निर्णायक है।
एक ट्रेंड होने के कारण खरीदी गई वस्तु जब बोरियत या परेशानी का कारण बनती है, तो उसे अगले ट्रेंड के लिए बदल दिया जाता है। यही चक्र भारत के जलाशयों को विदेशी प्रजातियों के लिए एक खुला द्वार बना रहा है।
उतारा मंदिराट्टा के अनुसार, सोशल मीडिया पर ट्रेंड होने वाले जानवरों की खरीदारी एक सामान्य बात बन गई है। लोग अक्सर शीतल या दुर्लभ दिखने वाले जानवरों को खरीदते हैं, लेकिन जब वे बोरियत का कारण बनते हैं, तो उन्हें अगले ट्रेंड के साथ बदल दिया जाता है। इस चक्र के कारण भारत के जलाशय विदेशी प्रजातियों के लिए एक खुला द्वार बन गए हैं, जिससे पर्यावरण पर गहरा असर पड़ रहा है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Keep subscribing to इशा रावHer next filing reaches you the moment it publishes, on her own subdomain.
Subscribe
