कभी विलुप्ति के कगार पर पहुँच चुका भारत का बाघ आज शानदार वापसी कर रहा है, और देश में अब दुनिया के लगभग तीन चौथाई जंगली बाघ रहते हैं, जो दशकों की कड़ी मेहनत और संरक्षण का सुखद नतीजा है।
घने जंगलों की गहराई में, जहाँ सूरज की रोशनी भी मुश्किल से जमीन तक पहुँच पाती है, एक शानदार शिकारी धीरे-धीरे अपने खोए हुए साम्राज्य पर फिर से अधिकार जमा रहा है। भारत का बाघ, जो कभी हमेशा के लिए गायब हो जाने के गंभीर खतरे में था, आज एक ऐसी वापसी कर रहा है जिसने पूरी दुनिया के वन्यजीव प्रेमियों का दिल जीत लिया है।
जंगल के राजा की वापसी
बाघ को यूँ ही जंगल का राजा नहीं कहा जाता, क्योंकि उसकी राजसी चाल, धारीदार सुनहरी खाल और गूँजती हुई गहरी दहाड़ किसी को भी मंत्रमुग्ध कर देती है। सदियों से यह भव्य जीव भारतीय संस्कृति, लोककथाओं और परंपराओं का एक अभिन्न हिस्सा रहा है, और आज भी देश के राष्ट्रीय पशु के रूप में बड़े गर्व के साथ पहचाना जाता है।
लेकिन इस राजसी छवि के पीछे एक ऐसी संघर्ष भरी कहानी छिपी हुई है जिसने कभी इस पूरी प्रजाति को लगभग समाप्त कर दिया था। यह कहानी केवल एक जानवर के पतन की नहीं, बल्कि मनुष्य के दृढ़ संकल्प और प्रकृति के प्रति उसकी जिम्मेदारी की भी है, जिसने आखिरकार इस शानदार शिकारी को एक नया जीवन दिया।
विलुप्ति के कगार पर
आज से लगभग सौ साल पहले भारत के घने जंगलों में बाघों की संख्या कई हजारों में हुआ करती थी, और वे देश के कोने-कोने में पूरी तरह स्वतंत्र रूप से विचरण करते थे। लेकिन बेतहाशा शिकार, उनके प्राकृतिक आवासों के लगातार विनाश और बढ़ती मानव आबादी के दबाव ने इस विशाल आबादी को बहुत तेजी से घटाना शुरू कर दिया।
स्थिति इतनी अधिक भयावह हो गई कि उन्नीस सौ सत्तर के दशक की शुरुआत तक पूरे देश में केवल लगभग अठारह सौ सत्ताईस बाघ ही किसी तरह बचे रह गए थे। यह चिंताजनक आँकड़ा एक गंभीर चेतावनी था, जो साफ बता रहा था कि यदि तुरंत कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया तो यह शानदार जीव हमेशा के लिए धरती से गायब हो जाएगा।
प्रोजेक्ट टाइगर की शुरुआत

इस गहराते हुए संकट को गंभीरता से देखते हुए भारत सरकार ने उन्नीस सौ तिहत्तर में एक अत्यंत महत्वाकांक्षी अभियान की शुरुआत की, जिसे प्रोजेक्ट टाइगर के नाम से जाना गया। इस दूरदर्शी पहल का मुख्य उद्देश्य बाघों को पूरी तरह सुरक्षित आवास प्रदान करना और उनकी लगातार घटती हुई आबादी को हर हाल में बचाना था।
इस बड़ी परियोजना की शुरुआत देश भर में शुरू में केवल नौ बाघ अभयारण्यों के साथ हुई थी, जहाँ इन जानवरों को शिकार और अन्य तमाम खतरों से पूरी तरह सुरक्षा दी गई। समय बीतने के साथ यह अभियान लगातार फैलता चला गया, और आज देश में ऐसे संरक्षित बाघ अभयारण्यों की संख्या बढ़कर पचास से भी अधिक हो चुकी है।
संख्या में लौटती उम्मीद
दशकों की धैर्यपूर्ण मेहनत और निरंतर संरक्षण प्रयासों का सुखद नतीजा अब आँकड़ों में साफ नजर आने लगा है। बाघों की संख्या धीरे-धीरे लेकिन बहुत लगातार बढ़ती चली गई, जो दो हजार चौदह में लगभग बाईस सौ थी, वह दो हजार अठारह तक बढ़कर लगभग तीन हजार के करीब जा पहुँची।
सबसे ताजा गणना के अनुसार अब भारत के जंगलों में लगभग तीन हजार छह सौ बयासी बाघ मौजूद हैं, जो अपने आप में एक बहुत बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है। इससे भी अधिक गर्व की बात यह है कि आज पूरी दुनिया के लगभग तीन चौथाई जंगली बाघ अकेले भारत की ही धरती पर निवास करते हैं।
सिर्फ एक जानवर नहीं
बाघों का संरक्षण केवल एक अकेली प्रजाति को बचाने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसका असली महत्व कहीं अधिक गहरा और व्यापक है। बाघ खाद्य श्रृंखला के सबसे शीर्ष पर बैठा एक ऐसा शिकारी है, जिसकी मौजूदगी पूरे जंगल के स्वास्थ्य और नाजुक संतुलन को बनाए रखने में बेहद अहम भूमिका निभाती है।
जब किसी जंगल में बाघ सुरक्षित और स्वस्थ रहते हैं, तो इसका सीधा सा अर्थ यही है कि वहाँ का पूरा पारिस्थितिकी तंत्र भी भरपूर फल-फूल रहा है। इस तरह बाघों की रक्षा करके हम असल में उन असंख्य अन्य जीवों, नदियों और जंगलों की भी रक्षा करते हैं, जो अंततः मनुष्यों के अपने जीवन के लिए भी बेहद अनिवार्य हैं।
आगे की राह
इन तमाम शानदार उपलब्धियों के बावजूद बाघों के संरक्षण की राह अभी भी पूरी तरह चुनौतियों से मुक्त नहीं हुई है। बढ़ती हुई आबादी के लिए पर्याप्त और आपस में जुड़े हुए जंगलों की सख्त आवश्यकता है, ताकि बाघ स्वतंत्र रूप से घूम सकें और मनुष्यों के साथ टकराव की दुखद घटनाओं को कम से कम किया जा सके।
फिर भी, भारत के बाघों की यह प्रेरक कहानी आज पूरी दुनिया के लिए आशा की एक चमकती हुई किरण बन चुकी है। यह हमें सिखाती है कि यदि दृढ़ इच्छाशक्ति और सच्चे सामूहिक प्रयास हों, तो प्रकृति को हुए गहरे से गहरे घावों को भी भरा जा सकता है और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक समृद्ध विरासत छोड़ी जा सकती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Keep subscribing to अर्जुन नायरHer next filing reaches you the moment it publishes, on her own subdomain.
Subscribe
