साल 2025 की नई गणना में भारत के जंगलों में करीब 22,446 जंगली हाथी दर्ज किए गए हैं। पश्चिमी घाट और पूर्वोत्तर इनके सबसे बड़े ठिकाने हैं। घटते जंगल, टूटते गलियारे और खेतों की ओर बढ़ते झुंडों के बीच, इंसान और हाथी के साथ जीने की राह पर एक नज़र।
सूखा गाँवों की ज़िंदगी को कैसे बदलता है, यह देखने मैं अक्सर खेतों और जंगल के किनारे बसे गाँवों में जाता रहता हूँ। वहाँ मुझे बार बार एक ही सच्चाई दिखाई देती है कि इंसान और जंगली हाथी आज एक ही ज़मीन पर साथ साथ जीने को मजबूर हैं। हाल ही में देश में हाथियों की नई गिनती सामने आई है, और यही सही मौका है कि हम इन विशाल लेकिन कोमल जीवों की दुनिया को थोड़ा और करीब से समझने की कोशिश करें।
हाथियों की नई गिनती
साल 2025 में जारी हुई ताज़ा गणना के अनुसार, भारत के जंगलों में इस समय करीब 22,446 जंगली हाथी मौजूद हैं। यह आँकड़ा भारतीय वन्यजीव संस्थान समेत सरकारी एजेंसियों के साझा प्रयास से तैयार किया गया है। सबसे खास बात यह रही कि इस बार गिनती के लिए पहली बार बड़े पैमाने पर वैज्ञानिक तरीका अपनाया गया, ताकि संख्या का अनुमान पहले से कहीं अधिक भरोसेमंद और सटीक बन सके। यही इस रिपोर्ट को बीते वर्षों से अलग बनाता है।
सबसे ज़्यादा हाथी कहाँ
देश में हाथियों की यह आबादी हर जगह एक जैसी नहीं है, बल्कि कुछ खास इलाकों में सिमटी हुई है। रिपोर्ट बताती है कि सबसे बड़ी संख्या दक्षिण भारत के पश्चिमी घाट में है, जहाँ करीब 11,934 हाथी दर्ज किए गए हैं। इसके बाद पूर्वोत्तर भारत का नंबर आता है, जहाँ लगभग 6,559 हाथी रहते हैं। यानी देश के हाथियों का सबसे बड़ा हिस्सा इन्हीं दो हरे भरे और घने वन क्षेत्रों में बसा हुआ है, जो इनके लिए सबसे मुफीद घर साबित हुए हैं।
राज्यों की तस्वीर
राज्यों के स्तर पर देखें तो कर्नाटक सबसे आगे है, जहाँ करीब 6,013 हाथी गिने गए हैं। इसके बाद असम में लगभग 4,159 और तमिलनाडु में करीब 3,136 हाथी मौजूद हैं। केरल में यह संख्या करीब 2,785 बताई गई है, जबकि उत्तराखंड में लगभग 1,792 और ओडिशा में करीब 912 हाथी दर्ज किए गए हैं। ये आँकड़े साफ बताते हैं कि हाथियों का संसार देश के दक्षिणी और पूर्वी हिस्सों में सबसे गहरा और जीवंत है।
गिनती का नया, भरोसेमंद तरीका
इस बार की गणना को खास बनाने वाली सबसे बड़ी वजह इसका तरीका है। पहली बार भारत में हाथियों को गिनने के लिए बड़े स्तर पर डीएनए आधारित पद्धति का इस्तेमाल किया गया। इसमें हाथियों के गोबर जैसे नमूनों से उनकी अलग अलग पहचान की जाती है, जिससे एक ही हाथी को दो बार गिनने की गलती काफी हद तक टल जाती है। इससे मिलने वाला अनुमान पुरानी पद्धतियों की तुलना में कहीं अधिक वैज्ञानिक और सटीक माना जा रहा है।
एक सौम्य दानव जो जंगल को सँभालता है

हाथी सिर्फ आकार में विशाल नहीं होते, बल्कि पूरे जंगल की सेहत के लिए भी बेहद अहम माने जाते हैं। चलते फिरते ये जीव अपने गोबर के ज़रिए बीजों को दूर दूर तक फैलाते हैं और नए पेड़ों को जन्म देने में मदद करते हैं। यही वजह है कि इन्हें एक तरह से जंगल का माली भी कहा जा सकता है। इनके इसी महत्व को देखते हुए भारत ने साल 2010 में हाथी को राष्ट्रीय धरोहर पशु का दर्जा दिया था, ताकि इनकी रक्षा को खास प्राथमिकता मिले।
प्रोजेक्ट एलिफेंट की शुरुआत
हाथियों को बचाने की कोशिशें भारत में कोई नई बात नहीं हैं। साल 1992 में सरकार ने प्रोजेक्ट एलिफेंट नाम की एक बड़ी योजना शुरू की थी। इसका मकसद सिर्फ हाथियों की रक्षा करना ही नहीं था, बल्कि उनके रहने के जंगल और आने जाने के रास्तों को भी सुरक्षित बनाए रखना था। इसके साथ ही इंसान और हाथी के बीच बढ़ते टकराव को कम करना और पालतू हाथियों की भलाई का ध्यान रखना भी इस योजना के प्रमुख लक्ष्यों में शामिल रहा है।
हाथियों के गलियारे
हाथी एक जगह टिककर रहने वाले जीव नहीं हैं, बल्कि भोजन और पानी की तलाश में लंबी लंबी दूरियाँ तय करते रहते हैं। इसी वजह से उनके लिए जंगलों को आपस में जोड़ने वाले गलियारों का बहुत महत्व है। विशेषज्ञों ने देश भर में करीब 150 ऐसे गलियारों की पहचान की है, जिनसे होकर हाथी सुरक्षित रूप से एक जंगल से दूसरे जंगल तक पहुँच सकें। इन रास्तों को बचाना और जहाँ ये टूट चुके हैं वहाँ फिर से जोड़ना आज सबसे ज़रूरी कामों में से एक है।
जब रास्ते टूट जाते हैं
असली मुश्किल तब खड़ी होती है, जब ये पुराने रास्ते धीरे धीरे टूटने लगते हैं। खेती के लिए जंगलों का कटना, सड़कों और रेल लाइनों का बिछना और खनन जैसी गतिविधियाँ हाथियों के इलाकों को छोटे छोटे टुकड़ों में बाँट देती हैं। रास्ता न मिलने पर हाथी मजबूरन गाँवों और खेतों की ओर निकल आते हैं। जंगल का लगातार सिकुड़ना और उसका बँटवारा ही असल में इंसान और हाथी के बीच बढ़ते टकराव की सबसे बड़ी जड़ मानी जाती है।
खेतों और हाथियों की टकराहट
गाँवों में घूमते हुए मैंने कई किसानों की परेशानी को बहुत करीब से महसूस किया है। रातोंरात एक झुंड पूरे खेत की फसल को रौंद सकता है, और महीनों की मेहनत पल भर में मिट्टी में मिल जाती है। दूसरी ओर, हाथी भी अक्सर घबराहट और भूख में ही इंसानी बस्तियों की तरफ बढ़ते हैं। यह टकराव किसी एक पक्ष की गलती नहीं, बल्कि सिकुड़ती ज़मीन पर साथ जीने की मजबूरी से पैदा हुई एक गहरी और पेचीदा उलझन है।
साथ रहने की राह
अच्छी खबर यह है कि इस उलझन का हल पूरी तरह नामुमकिन नहीं है। नई रिपोर्ट भी इस बात पर खास ज़ोर देती है कि हाथियों को बचाने में आसपास के गाँवों और समुदायों का साथ सबसे अहम है। जब स्थानीय लोग खुद संरक्षण का हिस्सा बनते हैं, फसल के नुकसान की उचित भरपाई होती है और समय रहते चेतावनी मिल जाती है, तो इंसान और हाथी दोनों के लिए एक ही ज़मीन पर साथ रहना कहीं आसान हो जाता है।
तकनीक जो मदद करती है
इस मुश्किल को कम करने में अब आधुनिक तकनीक भी अहम भूमिका निभाने लगी है। हाथियों की आवाजाही पर नज़र रखने के लिए उपग्रह और मानचित्रण जैसी तकनीकों का सहारा लिया जा रहा है। साल 2024 में शुरू किया गया प्रोजेक्ट सुरक्षा नाम का ऐप भी हाथियों की गतिविधियों को दर्ज करने में मदद करता है। ऐसी व्यवस्थाओं से गाँव वालों को समय पर सूचना मिल जाती है, जिससे कई संभावित हादसों को पहले ही टाला जा सकता है।
आगे की राह
फिर भी चुनौतियाँ अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं। घटते जंगल, बँटते रास्ते और बढ़ती आबादी के बीच हाथियों का भविष्य अब भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं कहा जा सकता। गलियारों को बचाना, उजड़े जंगलों को फिर से हरा करना और विकास की बड़ी योजनाओं में हाथियों की जगह को याद रखना बेहद ज़रूरी है। खेतों और गाँवों की ज़िंदगी को देखते हुए मैं मानता हूँ कि इन कोमल दानवों के साथ जीना सीखना ही हमारी असली परीक्षा है।

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