ततैया को देखकर अकसर लोग डर जाते हैं, पर यह छोटा कीट असल में खेतों का चुपचाप रक्षक है। सामाजिक ततैया इल्लियों और दूसरे हानिकारक कीटों का शिकार करके फसलों को बचाती है, बिना किसी कीटनाशक के। जानिए ततैया के जीवन, उसके डंक के पीछे के सच और प्रकृति में उसकी अनमोल भूमिका के बारे में।
ततैया का नाम सुनते ही अधिकतर लोगों के मन में डर की एक लहर दौड़ जाती है। पीले और काले रंग की यह चमकीली कीट, अपने तीखे डंक के कारण, बगीचों और घरों में अकसर एक अनचाहे मेहमान की तरह देखी जाती है। लेकिन इस डर के परे, ततैया दरअसल हमारे पर्यावरण और खेतों की एक बेहद मेहनती और उपयोगी सहयोगी है, जिसकी असली कहानी बहुत कम लोग जानते हैं।
मधुमक्खी नहीं, कुछ और
सबसे पहले तो ततैया को उसकी दूर की रिश्तेदार मधुमक्खी से अलग पहचानना ज़रूरी है। मधुमक्खी का शरीर रोएंदार और गठीला होता है, क्योंकि वह मुख्य रूप से फूलों के रस और पराग पर निर्भर रहती है। ततैया इसके उलट पतली, चिकनी और अधिक चमकदार होती है, और सबसे बड़ी बात यह कि वह एक कुशल शिकारी भी है, न कि केवल एक शाकाहारी संग्राहक।
कई प्रकार की ततैया सामाजिक कीट हैं, यानी वे बड़े समूहों में मिलकर रहती हैं। ये मिलकर एक अनोखा घोंसला बनाती हैं, जो देखने में कागज़ जैसा लगता है। असल में वे लकड़ी के रेशों को चबाकर और अपनी लार में मिलाकर एक तरह का प्राकृतिक कागज़ तैयार करती हैं, और उसी से अपने छत्तों की सुंदर, षट्कोणीय कोठरियाँ गढ़ती हैं।
आसमानी शिकारी
ततैया की असली ताकत उसके शिकारी स्वभाव में छिपी है। दुनिया भर में डंक मारने वाली ततैयों की लगभग तैंतीस हज़ार प्रजातियाँ मानी जाती हैं, और इनमें से सामाजिक ततैया विशेष रूप से भूखी परभक्षी होती हैं। वे इल्लियों, माहू और मक्खियों जैसे उन असंख्य छोटे कीटों का शिकार करती हैं, जो हमारी फसलों और पौधों को भारी नुकसान पहुँचाते हैं।
वैज्ञानिकों का कहना है कि लगभग हर बड़े फसल-नाशक कीट पर, कोई न कोई ततैया हमला ज़रूर करती है। मधुमक्खी की तरह किसी एक ही काम में माहिर होने के बजाय, सामाजिक ततैया एक बहुमुखी शिकारी है। इसका मतलब यह है कि वह एक ही समय में कई अलग-अलग तरह के हानिकारक कीटों की संख्या को काबू में रखने में पूरी तरह सक्षम होती है।
किसान की चुपचाप मदद

इसी खूबी के कारण ततैया खेतों की एक अनमोल रखवाली बन जाती है। अध्ययनों के अनुसार, कागज़ी ततैया की एक अकेली कॉलोनी अपने पूरे जीवनकाल में चार हज़ार से भी अधिक शिकार पकड़ सकती है। इनमें से नब्बे से पंचानबे प्रतिशत तक शिकार अकसर वही पत्ती खाने वाली इल्लियाँ होती हैं, जो मक्का और गन्ने जैसी फसलों को चट कर जाती हैं।
यही कारण है कि ततैया को एक स्वाभाविक और सस्ता जैविक नियंत्रण साधन माना जाता है। इसके इस्तेमाल में न तो अधिक खर्च आता है, न ही कीटों में इसके प्रति प्रतिरोध पैदा होता है, और सबसे बड़ी बात यह कि इससे खेतों में रासायनिक कीटनाशकों की ज़रूरत काफ़ी घट जाती है। भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए यह वाकई एक बड़ी बात है।
डंक क्यों मारती है
अब सवाल उठता है कि अगर ततैया इतनी उपयोगी है, तो वह डंक क्यों मारती है। इसका उत्तर काफ़ी सरल है, ततैया आमतौर पर तभी डंक मारती है जब उसे या उसके घोंसले को कोई ख़तरा महसूस होता है। उसका डंक कोई हमलावर हथियार नहीं, बल्कि आत्मरक्षा और अपने परिवार की सुरक्षा का एक ज़रिया है, जिसका वह बेवजह इस्तेमाल नहीं करती।
शरद ऋतु के आते-आते ततैयों की कॉलोनियाँ बिखरने लगती हैं और भोजन की कमी होने लगती है, जिससे वे कुछ अधिक बेचैन और आक्रामक दिखती हैं। ऐसे में उनके साथ शांति से पेश आना ही समझदारी है। उन्हें हाथ से मारने या घोंसले को छेड़ने के बजाय, अगर हम शांत बने रहें, तो अधिकतर मुलाकातें बिना किसी नुकसान के टल जाती हैं।
जीवन-जाल की एक कड़ी
ततैया केवल शिकारी ही नहीं, बल्कि प्रकृति के विशाल भोजन-जाल की एक ज़रूरी कड़ी भी है। वह खुद भी कई जीवों का आहार बनती है, जैसे कि पक्षी, मकड़ियाँ, प्रेइंग मैंटिस, छिपकलियाँ और मेंढक। इसके अलावा, फूलों पर रस पीने आते समय कुछ ततैया परागण में भी मदद करती हैं, ठीक वैसे ही जैसे उनकी चचेरी बहन मधुमक्खियाँ किया करती हैं।
अगर किसी दिन सारी ततैया अचानक ग़ायब हो जाएँ, तो इसका असर बहुत गहरा होगा। हानिकारक कीटों की संख्या तेज़ी से बढ़ जाएगी, फसलों को कहीं अधिक नुकसान होगा, और उन पर निर्भर रहने वाले कई जीवों की भोजन-शृंखला भी टूट जाएगी। इस तरह यह छोटी सी कीट, अनजाने ही, पूरे तंत्र को संतुलित बनाए रखने में एक बड़ी भूमिका निभाती है।
डर से परे देखना
ततैया की कहानी हमें सिखाती है कि किसी जीव को केवल उसकी डरावनी छवि के आधार पर आँकना कितना ग़लत हो सकता है। जिस कीट से हम अकसर बचकर भागते हैं, वही चुपचाप हमारे खेतों की रक्षा कर रही होती है। थोड़ी सी समझ और सम्मान के साथ, हम इस ग़लतफ़हमी के परदे को हटाकर इस नन्ही कीट की असली कीमत पहचान सकते हैं।
जैसे बीते वर्षों में लोगों ने मधुमक्खियों के महत्व को समझना शुरू किया है, वैसे ही अब समय है कि हम ततैया को भी उसका उचित सम्मान दें। ज़रूरी नहीं कि हम उसे पसंद ही करने लगें, पर इतना समझना काफ़ी है कि वह हमारे विरुद्ध नहीं, बल्कि प्रकृति के उसी संतुलन के पक्ष में काम कर रही है, जिस पर अंततः हम सब निर्भर हैं।
छोटे रक्षक, बड़ा योगदान
तो अगली बार जब कोई ततैया आपके आसपास मंडराए, तो घबराकर उसे मारने के बजाय एक पल रुककर सोचिए। हो सकता है कि वह अभी-अभी किसी खेत से किसी हानिकारक इल्ली का शिकार करके लौटी हो। यह नन्ही सी और बदनाम कीट असल में हमारी फसलों तथा पर्यावरण की एक मूक रक्षक है, जिसका योगदान उसके छोटे आकार से कहीं अधिक बड़ा है।

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