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पवित्र उपवन: भारत के वे देवजंगल जो आस्था के सहारे सदियों से जैव विविधता बचाते आए हैं

अर्जुन नायर अर्जुन नायर arjunnair.avalw.com · 333 reads Respect0 Save Share Read only
READS4live count PUBLISHED17 Sept2026 READING TIME4 min771 words LANGUAGEHindi
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भारत में अनुमानतः एक से डेढ़ लाख पवित्र उपवन हैं, जिन्हें देवराई, कावु और ओरण जैसे नामों से पूजा जाता है। आस्था के इन हरे टुकड़ों में दुर्लभ प्रजातियां बची हैं, और जुलाई 2026 में सरकार ने इन्हें बचाने के लिए एक बड़ी योजना को मंजूरी दी है।

किसी गांव के किनारे बसे पवित्र उपवन में जब आप पहली बार कदम रखते हैं, तो शहर की गर्मी अचानक पीछे छूट जाती है। ऊंचे, पुराने पेड़ों की घनी छांव, गिरती पत्तियों की खुशबू और एक अजीब सी शांति आपको घेर लेती है। यह कोई साधारण जंगल नहीं, बल्कि सदियों से आस्था के सहारे बचाया गया हरा टुकड़ा है।

आस्था से बंधे जंगल

पवित्र उपवन असल में जंगल के वे हिस्से हैं जिन्हें कोई समुदाय किसी देवी, देवता या पूर्वजों को समर्पित कर देता है। यहां पेड़ काटना, टहनी तोड़ना या शिकार करना वर्जित माना जाता है। लोगों का विश्वास है कि इस भूमि पर देवता का वास है, और इसी विश्वास ने इन जंगलों को पीढ़ियों तक सुरक्षित रखा है।

यह तरीका किसी कानून या बाड़ से कहीं ज्यादा असरदार साबित हुआ है। जहां आधुनिक कानून अक्सर कागजों तक सिमट जाते हैं, वहां आस्था का डर और सम्मान लोगों को खुद ब खुद पेड़ों की रक्षा करने पर मजबूर करता है। यही वजह है कि कई उपवन आज भी घने और लगभग अछूते खड़े हैं।

एक नहीं, लाखों

ऐसे उपवन देश में कोई गिनती भर के नहीं हैं। अनुमान है कि भारत में एक से डेढ़ लाख तक पवित्र उपवन मौजूद हैं, हालांकि अब तक इनमें से करीब चौदह हजार को ही औपचारिक रूप से दर्ज किया जा सका है। यानी इनकी असली संख्या हमारी दर्ज सूची से कहीं ज्यादा बड़ी है।

इनके नाम भी हर इलाके में बदल जाते हैं। महाराष्ट्र में इन्हें देवराई कहते हैं, केरल में कावु, राजस्थान में ओरण, झारखंड में सरना, हिमाचल में देव वन और मेघालय में ला किन्तांग। नाम भले अलग हों, पर भावना एक ही है, कि यह भूमि इंसान की नहीं, देवता की है।

जैव विविधता के छिपे खजाने

पेड़ की डाल पर बैठी एक भारतीय गिलहरी। पवित्र उपवनों के पुराने पेड़ पंछियों, गिलहरियों और तितलियों समेत असंख्य जीवों को पनाह देते हैं।
पेड़ की डाल पर बैठी एक भारतीय गिलहरी। पवित्र उपवनों के पुराने पेड़ पंछियों, गिलहरियों और तितलियों समेत असंख्य जीवों को पनाह देते हैं।

इन उपवनों की सबसे बड़ी देन इनकी जैव विविधता है। शोध बताते हैं कि अकेले मेघालय में कम से कम पचास दुर्लभ और संकटग्रस्त पौधों की प्रजातियां सिर्फ इन्हीं उपवनों में बची हैं। वहीं महज तीन उपवनों में की गई एक गिनती में तीन सौ पंचानबे पौधों की प्रजातियां मिलीं, जिनमें से करीब चौदह प्रतिशत सिर्फ उसी इलाके में पाई जाती हैं।

असल में ये उपवन प्राचीन जंगल के आखिरी बचे टुकड़ों की तरह हैं, जो आसपास की खेती और बस्तियों के बीच एक हरे द्वीप की तरह टिके हुए हैं। बरगद और पीपल जैसे विशाल पुराने पेड़, दुर्लभ जड़ी बूटियां, पंछी, तितलियां और जल स्रोत, सब इन्हीं की गोद में सुरक्षित रहते हैं।

गांव की धड़कन

पवित्र उपवन सिर्फ पेड़ पौधों का घर नहीं, गांव के जीवन की धड़कन भी हैं। कई उपवनों के भीतर या किनारे झरने और तालाब हैं, जो आसपास के खेतों और कुओं को पानी देते हैं। साल भर के त्योहार, मन्नतें और सामूहिक पूजा इन्हीं पेड़ों की छांव में होती आई हैं, जिससे इंसान और जंगल का रिश्ता जिंदा रहता है।

इनकी रक्षा अक्सर किसी सरकारी विभाग ने नहीं, बल्कि खुद गांव वालों ने की है। बुजुर्ग, पुजारी और खासकर महिलाएं पीढ़ियों से इस परंपरा को संभालती आई हैं। पेड़ों, जानवरों और मौसम के बारे में उनका गहरा ज्ञान किसी किताब में दर्ज नहीं, फिर भी बेहद कीमती है।

मंडराते खतरे

लेकिन यह विरासत अब खतरे में है। बढ़ते शहर, चौड़ी होती सड़कें, खेतों का फैलाव और जमीन पर कब्जे धीरे धीरे इन उपवनों को काट रहे हैं। कई जगह कभी घने रहे जंगल अब सिकुड़ कर चंद पेड़ों तक रह गए हैं, टुकड़ों में बंटे और चारों ओर से घिरे हुए।

इसके साथ ही पुरानी आस्थाएं भी कमजोर पड़ रही हैं। नई पीढ़ी का इन परंपराओं से जुड़ाव घटता जा रहा है, और जब देवता का डर कम होता है तो कुल्हाड़ी उठने में देर नहीं लगती। जिस विश्वास ने सदियों तक इन जंगलों को बचाया, उसी का कमजोर होना आज सबसे बड़ा संकट बनता जा रहा है।

आस्था वन संरक्षण योजना

इसी चिंता के बीच एक उम्मीद की खबर भी आई है। जुलाई 2026 में भारत सरकार ने आस्था वन संरक्षण योजना को मंजूरी दी, जो करीब तीन हजार करोड़ रुपये की एक बड़ी पहल है। इसका मकसद देश भर के लगभग पंद्रह हजार पवित्र उपवनों को औपचारिक रूप से पहचान कर उनकी रक्षा करना है।

यह योजना इसलिए खास है क्योंकि यह संरक्षण को संस्कृति से जोड़कर देखती है। यह मानती है कि इन जंगलों को बचाने का सबसे अच्छा तरीका उन्हीं समुदायों को साथ लेना है, जिन्होंने सदियों से इन्हें संभाला है, जंगल और आस्था को अलग करके नहीं, बल्कि साथ रखकर।

जहां जंगल और आस्था मिलते हैं

सूखे गांवों में घूमते हुए मैंने बार बार देखा है कि कैसे एक हरा उपवन पूरे इलाके के लिए राहत की सांस बन जाता है। यह हमें याद दिलाता है कि प्रकृति की रक्षा हमेशा बड़े राष्ट्रीय उद्यानों से ही नहीं होती, कभी कभी वह गांव के किनारे खड़े एक पुराने पेड़ और लोगों की सच्ची श्रद्धा से भी होती है।

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अर्जुन नायर 2026-09-17 · 4 min read · 4 reads
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