खेत में बैठा नन्हा टिड्डा देखने में मासूम लगता है, पर कभी-कभी यही साधारण कीट विनाशकारी टिड्डी दल में बदल जाता है। जानिए टिड्डा और टिड्डी का फर्क, वह रासायनिक स्विच जो शर्मीले कीट को राक्षस बनाता है, और 2020 में भारत पर हुआ बीते 27 वर्षों का सबसे भीषण टिड्डी हमला।
खेत के किनारे घास पर बैठा एक नन्हा टिड्डा देखने में बेहद मासूम लगता है। हरी या भूरी काया, लंबी पिछली टांगें और ज़रा सा पास जाते ही फुर्ती से छलांग लगाकर गायब हो जाने की आदत, अधिकतर समय बस यही उसकी पूरी कहानी होती है। वह एक शांत और अकेला रहने वाला कीट है, जिससे किसी को कोई नुकसान नहीं। लेकिन कभी-कभी यही साधारण सा टिड्डा एक ऐसे रूप में बदल जाता है जो सदियों से इंसान के लिए आतंक का पर्याय रहा है, विनाशकारी टिड्डी दल।
टिड्डा और टिड्डी: एक ही परिवार, दो चेहरे
पहली बात जो कम लोग जानते हैं, वह यह कि टिड्डी असल में एक तरह का टिड्डा ही है। दूसरे शब्दों में कहें तो हर टिड्डी एक टिड्डा है, पर हर टिड्डा टिड्डी नहीं होता। दुनिया में टिड्डों की हज़ारों प्रजातियां पाई जाती हैं, लेकिन उनमें से बीस से भी कम ऐसी हैं जिनमें झुंड बनाकर हमला करने की क्षमता होती है। यही झुंड बनाने वाली चंद खास प्रजातियां ही टिड्डी कहलाती हैं और असली तबाही मचाती हैं।
आम टिड्डा दरअसल एक बेहद उपयोगी और हानिरहित प्राणी है। वह अकेले रहना पसंद करता है, घास और पत्तियां खाता है, और खुद कई पक्षियों, छिपकलियों तथा दूसरे जीवों का भोजन बनकर प्रकृति के संतुलन को बनाए रखता है। छोटी सींगों यानी एंटीना और मज़बूत पिछली टांगों वाला यह कीट खेतों की सामान्य ज़िंदगी का एक हिस्सा है, जिसकी मौजूदगी से आमतौर पर किसी को कोई खतरा नहीं होता।
जब शर्मीला टिड्डा राक्षस बन जाता है

फिर आखिर वह कौन सा जादू है जो इसी शांत कीट को एक विनाशकारी शक्ति में बदल देता है? इसका राज़ छिपा है एक अनोखी क्षमता में, जिसे वैज्ञानिक अवस्था परिवर्तन या फेज़ पॉलीफेनिज़्म कहते हैं। जब लंबे सूखे के बाद अचानक अच्छी बारिश होती है और भरपूर भोजन उपलब्ध होता है, तो टिड्डे तेज़ी से बढ़ते हैं और एक ही जगह उनकी घनी भीड़ जमा हो जाती है। यही भीड़ उनके भीतर एक गहरा और तेज़ बदलाव शुरू कर देती है।
वैज्ञानिकों ने पाया है कि जब टिड्डे आपस में रगड़ खाते हैं और उनकी पिछली टांगें बार-बार एक दूसरे को छूती हैं, तो उनके शरीर में सेरोटोनिन नामक रसायन की मात्रा तेज़ी से बढ़ जाती है। यही रसायन उस स्विच की तरह काम करता है जो अकेले रहने वाले शर्मीले टिड्डे को एक दूसरे की ओर आकर्षित होने वाले, अत्यधिक सक्रिय और झुंडप्रिय जीव में बदल देता है। कुछ ही घंटों में उनका व्यवहार, और आगे चलकर उनका रंग तक बदलने लगता है।
आसमान को ढँकने वाली भूख
एक बार झुंड बन जाने के बाद टिड्डियां अपनी संख्या और अपनी भूख, दोनों से डरा देती हैं। एक बड़ा दल करोड़ों और अरबों कीटों से मिलकर बनता है, और उड़ते समय पूरा आसमान ढँक लेता है, मानो दिन में ही अंधेरा छा गया हो। हर टिड्डी रोज़ लगभग अपने वज़न के बराबर हरियाली चट कर जाती है, और इस तरह एक विशाल दल कुछ ही घंटों में खेत के खेत पूरी तरह उजाड़ देने की ताकत रखता है।
यही कारण है कि टिड्डी को मानव इतिहास के सबसे पुराने और सबसे भयानक कीटों में गिना जाता है। दुनिया की कई प्राचीन कथाओं और धर्मग्रंथों में टिड्डी दल के हमलों का ज़िक्र मिलता है, जहां वे अकाल और तबाही के प्रतीक माने गए हैं। रेगिस्तानी टिड्डी हवाओं के सहारे हज़ारों किलोमीटर तक का लंबा सफर तय कर सकती है, और अफ्रीका तथा अरब के रेगिस्तानों से उड़ती हुई सीधे भारत की सीमाओं तक पहुंच जाती है।
2020 का हमला: भारत का बड़ा संकट
भारत ने ऐसा ही एक बड़ा संकट हाल में वर्ष 2020 में झेला था। कोरोना महामारी के बीच, 13 मई 2020 को रेगिस्तानी टिड्डियों का दल पश्चिमी राज्य राजस्थान के रास्ते भारत में घुसा, जिसे बीते 27 वर्षों का सबसे भीषण हमला बताया गया। देखते ही देखते ये झुंड राजस्थान और गुजरात से आगे बढ़ते हुए देश के कई हिस्सों में फैल गए और जगह-जगह खड़ी फसलों पर टूट पड़े।
रिपोर्टों के अनुसार, इस प्रकोप ने राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश, हरियाणा, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और पंजाब समेत पश्चिमी तथा मध्य भारत के करीब सात राज्यों को प्रभावित किया। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन के अनुसार, 2020 के इस व्यापक प्रकोप के दौरान करोड़ों लोगों के सामने भोजन का संकट खड़ा हो गया, और फसलों तथा नियंत्रण अभियानों को मिलाकर अरबों डॉलर के नुकसान का अनुमान लगाया गया।
बदलती जलवायु और नया खतरा
चिंता की बात यह है कि बदलती जलवायु टिड्डियों के लिए हालात को और अधिक अनुकूल बना रही है। वैज्ञानिकों का मानना है कि अरब सागर में बढ़ते चक्रवात और रेगिस्तानी इलाकों में होने वाली असामान्य बारिश टिड्डियों को तेज़ी से पनपने का मौका देती है। इससे आने वाले वर्षों में भारत जैसे देशों पर टिड्डी हमलों का खतरा और बढ़ सकता है, खासकर उन मौसमों में जब वर्षा असामान्य रूप से अधिक और लंबी होती है।
राहत की बात यह है कि इस खतरे से निपटने के लिए व्यवस्थाएं भी मौजूद हैं। भारत में टिड्डी चेतावनी संगठन जैसी संस्थाएं लगातार रेगिस्तानी सीमाओं पर कड़ी नज़र रखती हैं, और खतरे की आशंका होते ही छिड़काव तथा दूसरे उपायों से झुंडों को समय रहते काबू में करने की कोशिश की जाती है। पड़ोसी देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के साथ आपसी तालमेल इस लड़ाई में बेहद अहम भूमिका निभाता है।
नन्हा जीव, बड़ा सबक
टिड्डी की यह पूरी कहानी हमें प्रकृति का एक गहरा सबक सिखाती है। यह याद दिलाती है कि कैसे एक छोटा और मामूली सा जीव भी, हालात के ज़रा से बदलने पर, एक विशाल और विनाशकारी शक्ति में तब्दील हो सकता है। यह असल में संतुलन की नाज़ुकता की कहानी है, जहां भरपूर बारिश और भोजन जैसी अच्छी मानी जाने वाली चीज़ें भी, गलत परिस्थितियों में, एक बड़े संकट की नींव रख सकती हैं।
फिर भी यह याद रखना बेहद ज़रूरी है कि दुनिया के अधिकांश टिड्डे हानिरहित और उपयोगी होते हैं, और तबाही मचाने वाली टिड्डियां उनका एक बहुत छोटा हिस्सा भर हैं। इसलिए इन कीटों से अंधाधुंध डरने के बजाय हमें उन्हें बेहतर ढंग से समझने, उन पर लगातार नज़र रखने और समय रहते सतर्क रहने की ज़रूरत है। यही समझदारी नन्हे टिड्डे और विशाल टिड्डी दल, दोनों के साथ जीने का सही रास्ता है।

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