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CLIMATE · INDIA

हज़ारों मील का सफर तय कर भारत आते प्रवासी पक्षी और उनकी आर्द्रभूमियां

अर्जुन नायर अर्जुन नायर arjunnair.avalw.com · 333 reads Respect0 Save Share Read only
READS508live count PUBLISHED11 Sept2026 READING TIME4 min764 words LANGUAGEHindi
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हर सर्दी में लाखों प्रवासी पक्षी मध्य एशियाई फ्लाईवे के रास्ते भारत पहुंचते हैं। चिलिका झील में दस लाख से ज़्यादा परिंदे, हिमालय पार करता पट्टीदार हंस और कच्छ के रण के फ्लेमिंगो, ये सब हमारी नब्बे से अधिक रामसर आर्द्रभूमियों में पनाह पाते हैं। खेतों में घूमते एक पत्रकार की नज़र से यह कहानी।

हर सर्दी में, जब उत्तर की ठंडी हवाएं तेज़ होने लगती हैं, हमारे आसमान अचानक जीवंत हो उठते हैं। हज़ारों किलोमीटर दूर से उड़कर आए पंछियों के झुंड, लंबी कतारों में आकाश को चीरते हुए हमारे तालाबों और झीलों की ओर उतरते हैं। खेतों में घूमते हुए मैंने कई बार इस अद्भुत नज़ारे को ठहरकर देखा है और मन ही मन हैरान हुआ हूं।

ये हैं प्रवासी पक्षी, जो हर साल सर्दियों में अपने ठंडे घरों को पीछे छोड़कर गर्म भारत की ओर चले आते हैं। बहुत कम लोग जानते हैं कि हमारा देश, दुनिया भर के लाखों परिंदों के लिए सर्दियां बिताने का एक बेहद अहम ठिकाना है, जहां वे अपने लिए भरपूर भोजन और सुरक्षित आश्रय दोनों पाते हैं।

मध्य एशियाई फ्लाईवे का पड़ाव

पक्षियों के प्रवास के लिए दुनिया में कुछ बड़े हवाई रास्ते तय हैं, जिन्हें फ्लाईवे कहा जाता है। इनमें से एक है मध्य एशियाई फ्लाईवे, जो करीब तीस देशों में फैला हुआ है और आर्कटिक महासागर से लेकर हिंद महासागर तक को आपस में जोड़ता है। इस विशाल रास्ते पर छह सौ से भी अधिक प्रजातियों के पक्षी हर साल सफर करते हैं।

भारत इस विशाल फ्लाईवे का एक बेहद प्रमुख पड़ाव है, और इसकी सबसे बड़ी वजह है हमारी ज़मीन की अनोखी विविधता। हिमालय की ऊंची आर्द्रभूमियों से लेकर गंगा के मैदान, रेगिस्तानी झीलें, समुद्री लैगून, मैंग्रोव और दक्षिण भारत के तालाब तक, यहां लगभग हर तरह के पक्षी के लिए एक उपयुक्त घर मौजूद है।

आर्द्रभूमियों का देश

इन परिंदों की असली पनाहगाह हमारी आर्द्रभूमियां यानी वेटलैंड्स हैं। भारत में अंतरराष्ट्रीय रूप से महत्वपूर्ण मानी जाने वाली ऐसी रामसर स्थलों की संख्या अब बढ़कर नब्बे से भी ऊपर पहुंच चुकी है, जो पूरे दक्षिण एशिया में सबसे अधिक है। अकेले तमिलनाडु राज्य में ही ऐसे बीस स्थल मौजूद हैं।

ये आर्द्रभूमियां सिर्फ पानी के ठहरे हुए हिस्से भर नहीं हैं। ये जीवन से भरपूर पूरे पारिस्थितिकी तंत्र हैं, जो मछलियों, कीड़ों और जलीय पौधों के रूप में प्रवासी पक्षियों को भरपूर भोजन देती हैं, और उन्हें लंबी तथा थका देने वाली उड़ान के बाद सुस्ताने और ताकत बटोरने की जगह भी देती हैं।

चिलिका की उड़ानें

गुलाबी फ्लेमिंगो के झुंड हर सर्दी में ईरान और अफ़गानिस्तान से उड़कर भारत की उथली खारी झीलों में उतरते हैं और उन्हें जीवंत रंगों से भर देते हैं।
गुलाबी फ्लेमिंगो के झुंड हर सर्दी में ईरान और अफ़गानिस्तान से उड़कर भारत की उथली खारी झीलों में उतरते हैं और उन्हें जीवंत रंगों से भर देते हैं।

इन सबमें सबसे मशहूर है ओडिशा की चिलिका झील, जो एशिया की सबसे बड़ी खारे पानी की झील मानी जाती है। प्रवास के चरम मौसम में यहां दो सौ से भी अधिक प्रजातियों के दस लाख से ज़्यादा पक्षी एक साथ जमा हो जाते हैं, जिनमें से लगभग आधे दूर देशों से आए हुए प्रवासी मेहमान होते हैं।

इनमें से कई पक्षी कैस्पियन सागर, बैकाल झील और साइबेरिया जैसे बर्फीले इलाकों से हज़ारों किलोमीटर का लंबा सफर तय करके यहां पहुंचते हैं। जब गुलाबी फ्लेमिंगो के झुंड झील के उथले पानी में उतरते हैं, तो पूरी झील मानो किसी जीवित और सांस लेती हुई तस्वीर में बदल जाती है।

हिमालय पार करने वाले परिंदे

इन मेहमानों में सबसे हैरान कर देने वाला है पट्टीदार हंस, जिसे बार हेडेड गूज भी कहा जाता है। यह अपेक्षाकृत छोटा सा परिंदा हर साल मध्य एशिया से उड़कर, दुनिया की सबसे ऊंची पर्वत श्रृंखला हिमालय को पार करते हुए भारत तक पहुंचता है। इसे भरतपुर, पोंग बांध और चिलिका जैसी जगहों पर आसानी से देखा जा सकता है।

इसी तरह, हमारे यहां दिखने वाले खूबसूरत फ्लेमिंगो कई बार ईरान और अफ़गानिस्तान से उड़कर आते हैं। कच्छ के रण की विशाल नमकीन दलदलों, पुलिकट झील और चिलिका में इनके बड़े बड़े झुंड सर्दियों भर डेरा डालते हैं और वसंत की शुरुआत तक यहीं आराम से ठहरते हैं।

पंखों वाले मेहमानों की पनाहगाहें

राजस्थान के भरतपुर में स्थित केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान इन परिंदों की एक और बेहद मशहूर पनाहगाह है। यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल यह उद्यान, नवंबर से फरवरी के बीच पक्षियों की तीन सौ सत्तर से भी अधिक प्रजातियों की चहचहाहट से पूरी तरह गुलज़ार रहता है।

वहीं कच्छ का रण, अपनी चमकती नमकीन ज़मीन के साथ, न सिर्फ फ्लेमिंगो बल्कि गंभीर रूप से संकटग्रस्त ग्रेट इंडियन बस्टर्ड यानी गोडावण जैसे दुर्लभ पक्षियों का भी घर है। ये सभी जगहें हर सर्दी में असंख्य परिंदों को बड़े प्यार से अपनी गोद में पनाह देती हैं।

एक साझी विरासत

खेतों और गांवों में घूमते हुए मैं अक्सर यह सोचता हूं कि ये परिंदे कितने चुपचाप हमारे पर्यावरण की सेहत का हाल बयां करते हैं। जहां पानी साफ है और आर्द्रभूमि सुरक्षित है, वहां ये हर साल लौटकर आते हैं। और जहां ये अचानक गायब होने लगें, वहां समझ लेना चाहिए कि प्रकृति में कहीं कुछ गड़बड़ है।

ये प्रवासी पक्षी किसी एक देश की मिल्कियत नहीं हैं, बल्कि सीमाओं के पार फैली हुई एक साझी प्राकृतिक विरासत हैं। इनकी आर्द्रभूमियों को बचाना दरअसल अपनी ही धरती और अपने ही भविष्य को बचाना है, ताकि हर सर्दी में हमारा आसमान इसी तरह पंखों की आवाज़ से भरा रहे।

1 responses

यहाँ चिलिका झील के बारे में काफी कुछ सीखा.

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अर्जुन नायर 2026-09-11 · 4 min read · 508 reads
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