साल 2024 की चौथी वैश्विक प्रवाल विरंजन घटना में लक्षद्वीप को रिकॉर्ड 9.2 डिग्री हीटिंग वीक की गरमी झेलनी पड़ी। एक अध्ययन बताता है कि यहां जीवित प्रवाल का आवरण चौबीस साल में करीब आधा रह गया है।
समुद्र की सतह के नीचे एक ऐसी दुनिया बसती है जिसे अक्सर समुद्र का वर्षावन कहा जाता है। रंग बिखेरती प्रवाल भित्तियां असल में लाखों जीवों का घर हैं, मछलियों की नर्सरी हैं और तटों की प्राकृतिक ढाल भी। लेकिन गरमाते महासागरों ने इस नाज़ुक दुनिया पर गहरा संकट खड़ा कर दिया है। भारत के लक्षद्वीप की भित्तियां इसकी सबसे दर्दनाक मिसाल बनकर उभरी हैं, और आंकड़े इस चिंता को और गहरा करते हैं।
प्रवाल भित्तियां क्यों ज़रूरी हैं
प्रवाल भित्तियां समुद्र के कुल क्षेत्रफल का बेहद छोटा हिस्सा घेरती हैं, फिर भी समुद्री जैव विविधता का बहुत बड़ा हिस्सा इन्हीं पर निर्भर करता है। अनगिनत मछलियां, कछुए, केकड़े और दूसरे जीव यहीं पलते और छिपते हैं। इसके अलावा ये भित्तियां तूफानी लहरों की ताकत तोड़कर तटीय गांवों की रक्षा करती हैं और मछुआरों की आजीविका का आधार भी बनती हैं। इनका नष्ट होना सिर्फ प्रकृति का नहीं, इंसानी जीवन का भी नुकसान है।
विरंजन यानी ब्लीचिंग क्या है
प्रवाल दरअसल नन्हे जीवों की बस्ती है, जिनके भीतर ज़ूजैंथेली नाम के सूक्ष्म शैवाल रहते हैं। यही शैवाल प्रवाल को उसका रंग और भोजन दोनों देते हैं। जब समुद्र का पानी सामान्य से ज़्यादा गरम हो जाता है, तो तनाव में आकर प्रवाल इन शैवालों को अपने शरीर से बाहर निकाल देता है। रंग चला जाता है और प्रवाल सफेद पड़ जाता है। इसी को विरंजन या ब्लीचिंग कहते हैं। अगर गरमी लंबे समय तक बनी रहे तो भूखा प्रवाल मर भी सकता है।
डिग्री हीटिंग वीक का पैमाना
समुद्र की इस गरमी को नापने के लिए वैज्ञानिक डिग्री हीटिंग वीक यानी डीएचडब्ल्यू नाम का पैमाना इस्तेमाल करते हैं। यह बीते तीन महीनों में जमा हुए ताप-दबाव को जोड़कर बताता है कि प्रवाल पर कितना तनाव पड़ा। आमतौर पर माना जाता है कि जब यह मान चार से ऊपर पहुंचता है, तो गंभीर विरंजन शुरू हो जाता है, और मान जितना ऊंचा होता है, नुकसान उतना ही भयावह होता जाता है। यही आंकड़ा लक्षद्वीप की कहानी में सबसे डरावना मोड़ लाता है।
चौथी वैश्विक विरंजन घटना
अमेरिकी संस्था एनओएए ने 15 अप्रैल 2024 को दुनिया की चौथी वैश्विक प्रवाल विरंजन घटना की शुरुआत की घोषणा की। यह वही दौर था जब अल नीनो के असर से महासागर असामान्य रूप से गरम हो रहे थे। कैरिबियन से लेकर हिंद महासागर तक, दुनिया भर की भित्तियां एक साथ सफेद पड़ने लगीं। भारत भी इससे अछूता नहीं रहा, और देश के अलग-अलग प्रवाल क्षेत्रों पर वैज्ञानिकों ने मिलकर इसका असर आंकने की बड़ी कोशिश शुरू की।
लक्षद्वीप पर सबसे गहरी चोट
रिपोर्टों के अनुसार, भारत के छह प्रमुख प्रवाल क्षेत्रों के आकलन में लक्षद्वीप सबसे ज़्यादा प्रभावित पाया गया। एनओएए कोरल रीफ वॉच के आंकड़ों की मानें तो साल 2024 में लक्षद्वीप ने 9.2 डिग्री हीटिंग वीक का रिकॉर्ड ताप-दबाव झेला, जबकि इससे पहले का सबसे ऊंचा आंकड़ा 2010 में 6.7 था। यानी बीते तमाम बरसों की तुलना में यह गरमी कहीं अधिक तीखी और घातक थी, और इसका असर भित्तियों पर साफ दिखाई दिया।
चौबीस साल में आधे रह गए प्रवाल

जुलाई 2025 में एक शोध पत्रिका में छपे अध्ययन ने इस गिरावट को और स्पष्ट किया। भारत और स्पेन के वैज्ञानिकों ने अगत्ती, कदमत और कवरत्ती के बारह स्थलों का अध्ययन कर पाया कि लक्षद्वीप में जीवित प्रवाल का आवरण 1998 के 37.24 प्रतिशत से घटकर 2022 में सिर्फ 19.06 प्रतिशत रह गया है। यानी चौबीस साल में यह करीब आधा हो चुका है। रंगों से भरी एक पूरी दुनिया का इस तरह सिमटना किसी चेतावनी से कम नहीं।
बार-बार पड़ती मार
यह गिरावट एक झटके में नहीं आई, बल्कि बार-बार पड़ी मार का नतीजा है। अध्ययन के मुताबिक 1998 में जब डीएचडब्ल्यू 5.3 पर पहुंचा तो 28 प्रतिशत तक प्रवाल आवरण खत्म हो गया। साल 2010 में 6.7 का ताप-दबाव सबसे विनाशकारी साबित हुआ और भारी संख्या में प्रवाल मरे। वहीं 2016 में 5.2 डीएचडब्ल्यू के बावजूद औसत गिरावट सिर्फ 1.8 प्रतिशत रही। हर घटना ने भित्ति को थोड़ा और कमज़ोर छोड़ा।
उबरने के लिए चाहिए वक्त
प्रवाल भित्तियां पूरी तरह मर नहीं जातीं, बशर्ते उन्हें सांस लेने का पर्याप्त समय मिले। शोधकर्ताओं का कहना है कि तेज़ी से बढ़ने वाली प्रजातियों को उबरने के लिए दो विरंजन घटनाओं के बीच करीब छह साल का अंतराल चाहिए। लेकिन 2010 और 2016 के बीच का फासला इतना कम था कि एक्रोपोरा जैसी तेज़ बढ़ने वाली प्रजातियां ठीक से संभल ही नहीं पाईं। जब मार बार-बार पड़े और सुस्ताने का मौका न मिले, तो सबसे मजबूत भित्ति भी दम तोड़ने लगती है।
बदलती हुई पहचान
लगातार पड़ती इस मार ने लक्षद्वीप की भित्तियों की बनावट ही बदल दी है। वैज्ञानिकों के अनुसार बाद की घटनाओं में मृत्यु दर कुछ कम इसलिए दिखी क्योंकि गरमी के प्रति संवेदनशील प्रवाल पहले ही खत्म हो चुके थे। अब वहां पोराइटीस जैसी सख्तजान और ताप सहन कर लेने वाली प्रजातियां हावी होती जा रही हैं। यह किसी राहत की नहीं, बल्कि एक बदलती पहचान की कहानी है, जहां विविधता घटकर चंद मजबूत प्रजातियों में सिमटती जा रही है।
भारत के दूसरे प्रवाल क्षेत्र
लक्षद्वीप अकेला नहीं है। भारत के पास मन्नार की खाड़ी, कच्छ की खाड़ी, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह तथा पाक की खाड़ी जैसे कई अहम प्रवाल क्षेत्र हैं। इनमें से हर एक अपनी-अपनी परिस्थितियों के साथ जलवायु के इस दबाव का सामना कर रहा है। किसी क्षेत्र में स्थानीय कारक थोड़ी ढाल बनते हैं, तो कहीं हालात और नाज़ुक हैं। पूरे उपमहाद्वीप के तटों पर फैली ये भित्तियां मिलकर एक साझा और गहराते संकट की तस्वीर पेश करती हैं।
जलवायु और पर्यटन का दोहरा दबाव
प्रवाल भित्तियों पर सिर्फ गरमाते समुद्र का ही दबाव नहीं है। कई रिपोर्टें बताती हैं कि बढ़ता पर्यटन, प्रदूषण और तटीय गतिविधियां भी इन नाज़ुक तंत्रों को नुकसान पहुंचा रही हैं। एक तरफ जलवायु परिवर्तन पानी को गरम कर रहा है, तो दूसरी तरफ इंसानी हलचल भित्तियों को उबरने का मौका नहीं दे रही। यह दोहरा दबाव मिलकर उस संतुलन को तोड़ रहा है, जिसे बनने में प्रकृति ने हज़ारों साल लगाए थे।
उम्मीद अब भी बाकी है
तस्वीर भले धुंधली हो, पर पूरी तरह अंधेरी नहीं है। दुनिया भर में वैज्ञानिक, गोताखोर और आम नागरिक मिलकर भित्तियों की निगरानी कर रहे हैं और ताप सहने वाली प्रजातियों की पहचान कर रहे हैं। असली समाधान तो कार्बन उत्सर्जन घटाकर समुद्र को ठंडा रखने में ही है, लेकिन साथ ही स्थानीय दबाव कम करना भी उतना ही ज़रूरी है। लक्षद्वीप की भित्तियां हमें याद दिलाती हैं कि प्रकृति की चेतावनी को अनसुना करना अब हमारे बस की बात नहीं रही।

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