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जंगलों को निगलती लैंटाना: भारत की जैव विविधता पर मंडराता विदेशी पौधे का खतरा

अर्जुन नायर अर्जुन नायर arjunnair.avalw.com · 333 reads Respect0 Save Share Read only
READS502live count PUBLISHED8 Sept2026 READING TIME3 min660 words LANGUAGEHindi
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सजावटी पौधे के रूप में भारत आई लैंटाना कैमरा अब जंगलों में घने झुरमुट बनाकर देशी वनस्पति और वन्यजीवों के चारे को दबा रही है, जिससे जैव विविधता पर गहरा संकट मंडरा रहा है।

भारत के जंगल इन दिनों एक चुपचाप बढ़ते संकट का सामना कर रहे हैं। यह संकट किसी बड़े जानवर या बदलते मौसम का नहीं, बल्कि एक छोटे से विदेशी पौधे का है। लैंटाना कैमरा नाम का यह पौधा देश के जंगलों में तेज़ी से फैलकर वहाँ की जैव विविधता के लिए एक बड़ा खतरा बन चुका है।

रिपोर्टों के अनुसार, लैंटाना मूल रूप से भारत का पौधा नहीं है। इसे उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में एक सजावटी पौधे के रूप में यहाँ लाया गया था। लेकिन समय के साथ यह बगीचों की सीमा लाँघकर जंगलों तक जा पहुँचा और वहाँ लगभग बेरोकटोक फैलता चला गया।

कितना फैल चुका है यह पौधा

इस पौधे के फैलाव का पैमाना सचमुच चौंकाने वाला है। एक अध्ययन के अनुसार, लैंटाना भारत के बाघ क्षेत्र के लगभग चालीस प्रतिशत हिस्से में अपनी जड़ें जमा चुका है। यह आँकड़ा साफ़ बताता है कि यह समस्या कितनी गहरी और कितनी व्यापक हो चुकी है।

अनुमानों के मुताबिक, देश का लगभग तीन लाख वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र इस पौधे के फैलाव के खतरे में है। यह भारत के वन क्षेत्र का एक बहुत बड़ा हिस्सा है, और इतने विशाल इलाके में जैव विविधता के नुकसान का जोखिम बेहद चिंताजनक माना जा रहा है।

विशेषज्ञों के अनुसार, शिवालिक की पहाड़ियाँ, मध्य भारत और दक्षिणी पश्चिमी घाट इस समस्या से सबसे अधिक प्रभावित इलाके हैं। इन क्षेत्रों के जंगलों में लैंटाना ने अपनी पकड़ इतनी मज़बूत बना ली है कि अब उसे हटाना कोई आसान काम नहीं रह गया है।

देशी वनस्पति पर असर

भारत के हरे-भरे जंगल, जहाँ देशी वनस्पति और वन्यजीवों के बीच एक नाज़ुक संतुलन बना रहता है।
भारत के हरे-भरे जंगल, जहाँ देशी वनस्पति और वन्यजीवों के बीच एक नाज़ुक संतुलन बना रहता है।

लैंटाना की सबसे बड़ी ख़ासियत, और यही उसका सबसे बड़ा ख़तरा भी है, उसका घने झुरमुट बनाना है। जहाँ भी यह पौधा जड़ पकड़ता है, वहाँ यह इतनी सघनता से बढ़ता है कि आसपास की देशी घास, झाड़ियों और छोटे पौधों को पनपने का मौका ही नहीं मिल पाता।

इस तरह धीरे-धीरे जंगल की ज़मीन से देशी वनस्पति गायब होने लगती है। जो जंगल कभी विविध पेड़-पौधों से भरे रहते थे, वे एक ही विदेशी पौधे के कब्ज़े में आ जाते हैं। इसका असर पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के नाज़ुक संतुलन पर पड़ने लगता है।

वन्यजीवों पर मंडराता संकट

देशी घास और पौधों के घटने का सीधा असर जंगल के शाकाहारी जानवरों पर पड़ता है। चीतल, सांभर और नीलगाय जैसे वन्यजीव इन्हीं घासों और झाड़ियों पर निर्भर रहते हैं। लैंटाना के फैलने के साथ उनके चारे की उपलब्धता लगातार घटती चली जा रही है।

जब शाकाहारी जानवरों के लिए भोजन कम होता है, तो उनकी संख्या पर भी उसका असर पड़ता है। और यही असर आगे चलकर उन बड़े मांसाहारी जानवरों तक पहुँचता है, जो इन्हीं शाकाहारी जीवों का शिकार करके जीवित रहते हैं। इस तरह पूरी खाद्य शृंखला प्रभावित होती है।

विशेषज्ञ बताते हैं कि लैंटाना से भरे जंगल देखने में भले ही हरे-भरे लगें, लेकिन वन्यजीवों के भोजन के मामले में वे लगभग खाली होते हैं। यह हरियाली एक तरह का धोखा है, जिसके पीछे जैव विविधता का गहरा नुकसान अक्सर छिपा रह जाता है।

इस चुनौती से कैसे निपटें

लैंटाना को जंगलों से हटाना अपने आप में एक बड़ी और कठिन चुनौती है। इसकी जड़ें बहुत मज़बूत होती हैं और इसे एक बार हटाने के बाद भी यह अक्सर दोबारा उग आता है। इसीलिए इसके प्रबंधन के लिए लगातार और सुनियोजित प्रयासों की ज़रूरत होती है।

कई जगहों पर लैंटाना को हटाकर वहाँ फिर से देशी घास और पौधों को उगाने के प्रयास किए जा रहे हैं। ऐसे प्रयास समय और मेहनत तो ख़ूब माँगते हैं, लेकिन जंगल की सेहत और वन्यजीवों के भविष्य के लिए इन्हें बेहद ज़रूरी माना जा रहा है।

भविष्य की राह

लैंटाना की यह कहानी हमें याद दिलाती है कि किसी विदेशी प्रजाति को किसी नए इलाके में लाना कितना दूरगामी असर डाल सकता है। कभी एक सजावटी पौधे के रूप में लाया गया यह पौधा आज पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के लिए एक बड़ा सिरदर्द बन चुका है।

आने वाले समय में भारत के जंगलों और उनकी जैव विविधता को बचाने के लिए, लैंटाना जैसी आक्रामक प्रजातियों पर लगातार नज़र रखना और उनका प्रबंधन करना बेहद अहम होगा। यह काम केवल विशेषज्ञों का नहीं, बल्कि पूरे समाज की साझा ज़िम्मेदारी है।

2 responses

जैव विविधता पर संतुलित नज़रिया.

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यहाँ जैव विविधता के बारे में काफी कुछ सीखा.

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अर्जुन नायर 2026-09-08 · 3 min read · 502 reads
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