दशकों तक विलुप्त रहने के बाद चीता भारत के जंगलों में लौट आया है। प्रोजेक्ट चीता के चार साल पूरे होने पर देश में चीतों की संख्या 52 पहुंची, जिनमें 32 का जन्म भारत में ही हुआ। पढ़िए इस ऐतिहासिक वापसी की कहानी।
कई दशकों तक भारत के घने जंगलों में एक गहरा सन्नाटा पसरा हुआ था, क्योंकि दुनिया का सबसे तेज़ दौड़ने वाला जानवर, यानी चीता, हमारी इस धरती से पूरी तरह विलुप्त हो चुका था। लेकिन आज हालात पूरी तरह बदल चुके हैं, और एक बेहद महत्वाकांक्षी परियोजना की बदौलत इन खूबसूरत जीवों की मौजूदगी एक बार फिर से भारतीय जंगलों में महसूस की जाने लगी है।
एक ऐतिहासिक वापसी
इस पूरी कहानी की शुरुआत आज से कुछ साल पहले एक बेहद साहसिक कदम के साथ हुई थी। रिपोर्ट के अनुसार, प्रोजेक्ट चीता नाम की इस पहल के तहत वर्ष 2022 में अफ्रीकी देश नामीबिया से पूरे आठ चीतों को लाकर भारत की धरती पर बसाया गया, जो अपने आप में एक ऐतिहासिक और अभूतपूर्व घटना थी।
यह केवल कुछ जानवरों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने भर की साधारण बात नहीं थी। रिपोर्ट के अनुसार, इसका असली मकसद उस प्रजाति को दोबारा भारत में बसाना था, जो कभी यहां के जंगलों की शान हुआ करती थी, और इस तरह एक टूटी हुई प्राकृतिक कड़ी को फिर से जोड़ने का बड़ा प्रयास किया गया।
चार साल का सफर
इस अनोखे प्रयोग को शुरू हुए अब पूरे चार साल बीत चुके हैं, और इस दौरान इस परियोजना ने वाकई एक लंबा सफर तय किया है। आधिकारिक समीक्षा के अनुसार, हाल ही में जब प्रोजेक्ट चीता ने अपने चार साल पूरे किए, तो इसे अब स्थिरता और स्थापना के एक नए तथा बेहद अहम चरण में प्रवेश करता हुआ बताया गया है।
इन चार वर्षों में हासिल की गई सबसे बड़ी उपलब्धि आंकड़ों में बिलकुल साफ झलकती है। रिपोर्ट के अनुसार, आज भारत में चीतों की कुल संख्या बढ़कर 52 तक पहुंच चुकी है, जो इस बात का पुख्ता सबूत है कि यह महत्वाकांक्षी परियोजना धीरे-धीरे अपने तय लक्ष्य की ओर पूरी मजबूती के साथ आगे बढ़ रही है।
भारत की धरती पर जन्मे शावक

इन 52 चीतों की कुल संख्या में एक आंकड़ा सबसे अधिक उत्साहित करने वाला है और सबसे खास भी। रिपोर्ट के अनुसार, इनमें से पूरे 32 चीते ऐसे हैं जिनका जन्म खुद भारत की ही धरती पर हुआ है, यानी अब हमारे यहां चीतों की एक बिलकुल नई और स्वस्थ पीढ़ी पल-बढ़ रही है।
भारत में जन्मे इन नन्हे शावकों का होना किसी भी पुनर्वास परियोजना की सबसे बड़ी सफलता मानी जाती है। रिपोर्ट के अनुसार, इसका सीधा मतलब यह है कि लाए गए चीते न केवल यहां आराम से जीवित रह पा रहे हैं, बल्कि उन्होंने इस नए वातावरण में सहज होकर अपना परिवार भी आगे बढ़ाना शुरू कर दिया है।
कुनो से आगे का विस्तार
फिलहाल इन तमाम चीतों का मुख्य ठिकाना मध्य प्रदेश का कुनो राष्ट्रीय उद्यान ही बना हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार, मौजूदा 52 चीतों में से पूरे 49 चीते इसी कुनो में रह रहे हैं, जबकि बाकी बचे तीन चीतों को गांधी सागर अभयारण्य में एक नए घर के रूप में बसाया गया है।
हालांकि इस परियोजना की योजनाएं अब केवल कुनो तक ही सीमित नहीं रहने वाली हैं। रिपोर्ट के अनुसार, आने वाले समय में गांधी सागर अभयारण्य के साथ-साथ गुजरात के प्रसिद्ध बन्नी घास के मैदानों को भी चीतों के नए बसेरे के रूप में विकसित करने की तैयारी इस समय जोरों पर चल रही है।
जंगल में रचते-बसते चीते
किसी भी जानवर के लिए एक बिलकुल नए महाद्वीप और अनजान वातावरण में खुद को ढाल पाना एक बेहद कठिन चुनौती होती है। रिपोर्ट के अनुसार, इस परियोजना की देखरेख कर रहे अधिकारियों ने बताया कि यहां चीतों की जीवित रहने की दर और शिकार करने की सफलता दुनिया के दूसरे ऐसे प्रयासों के लगभग बराबर ही रही है।
इस बात के भी पुख्ता प्रमाण मिले हैं कि चीते अब यहां की परिस्थितियों में पूरी तरह से रम गए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, इन चीतों द्वारा जंगल में किए गए स्वाभाविक शिकार यह साफ दर्शाते हैं कि उन्होंने भारतीय भूभाग और यहां के जंगली जीवन के साथ खुद को बखूबी और सफलतापूर्वक ढाल लिया है।
संरक्षण की नई उम्मीद
प्रोजेक्ट चीता की यह शानदार सफलता दरअसल भारत के व्यापक वन्यजीव संरक्षण प्रयासों की एक बड़ी तस्वीर का ही अहम हिस्सा है। रिपोर्ट के अनुसार, बाघों और अन्य कई प्रजातियों को बचाने की दिशा में देश पहले से ही उल्लेखनीय काम कर रहा है, और चीतों की यह वापसी इस पूरी कड़ी में एक नया और चमकदार अध्याय जोड़ती है।
आखिरकार, चीतों की यह वापसी केवल एक प्रजाति के लौट आने भर की कहानी नहीं है, बल्कि यह प्रकृति के प्रति हमारी सामूहिक जिम्मेदारी का भी एक सुंदर प्रतीक है। यदि आने वाले वर्षों में भी यही लगन और मेहनत बनी रही, तो वह दिन दूर नहीं जब भारत के घास के मैदानों में चीतों को स्वच्छंद दौड़ते देखना एक आम बात बन जाएगी।

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