दुनिया के लगभग तीन चौथाई जंगली बाघ आज भारत में रहते हैं, और देश ने अपने राष्ट्रीय पशु को विलुप्ति के कगार से वापस लाने में बड़ी सफलता पाई है। अब शुरू हुई नई अखिल भारतीय बाघ गणना का ध्यान सिर्फ़ संख्या पर नहीं, बल्कि जंगलों को जोड़ने वाले उन गलियारों पर भी है जो बाघों के भविष्य के लिए बेहद ज़रूरी हैं
जंगल का राजा कहे जाने वाले बाघ की दहाड़ आज भारत के घने वनों में पहले से कहीं ज़्यादा गूँज रही है, और यही सबसे बड़ी वजह है कि पूरी दुनिया की निगाहें एक बार फिर से देश की ओर टिकी हुई हैं। हाल ही में भारत ने अपने बाघों की नई गणना की शुरुआत की है, जो अपने आप में एक बेहद विशाल और बहुत महत्वपूर्ण अभियान माना जा रहा है।
बाघों का सबसे बड़ा घर
आज दुनिया भर में बचे हुए जंगली बाघों में से लगभग तीन चौथाई अकेले भारत की धरती पर ही पाए जाते हैं, और यही आँकड़ा इस बात का पुख़्ता सबूत है कि इस राजसी जानवर को बचाने की दिशा में देश ने बीते कुछ दशकों में कितनी बड़ी और सराहनीय कामयाबी हासिल की है।
पिछली बड़ी गणना के अनुसार देश में बाघों की कुल संख्या करीब तीन हज़ार छह सौ से भी अधिक आँकी गई थी, और तब से लेकर अब तक इनकी आबादी लगभग हर साल लगातार बढ़ती चली जा रही है, जो संरक्षण के क्षेत्र में किए जा रहे तमाम प्रयासों की सफलता को बहुत साफ़ तौर पर दर्शाता है।
दुनिया की सबसे बड़ी वन्यजीव गणना

बाघों की यह गणना केवल भारत के लिए ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए बेहद खास मानी जाती है, क्योंकि क्षेत्रफल, इसमें शामिल लोगों की संख्या और इस्तेमाल की जाने वाली तकनीक के लिहाज़ से यह धरती पर अब तक की सबसे विशाल वन्यजीव गणना के रूप में दर्ज की जा चुकी है।
इस बार यह पूरा अभियान अपने छठे चरण में पहुँच चुका है, जिसकी शुरुआत हाल ही में हुई है और जिसके अंतिम नतीजे आने वाले कुछ समय बाद ही सामने आने की उम्मीद है, तब तक हज़ारों वनकर्मी और विशेषज्ञ जंगलों में दिन रात मेहनत करते हुए हर छोटी बड़ी जानकारी बड़े धैर्य से जुटाते रहेंगे।
संख्या से आगे की सोच
इस बार की गणना की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें केवल यह गिनना ही काफ़ी नहीं समझा जा रहा कि देश में कुल कितने बाघ मौजूद हैं, बल्कि इस बात पर भी बहुत गहराई से ध्यान दिया जा रहा है कि ये बाघ असल में कहाँ कहाँ रह रहे हैं और उनके पास घूमने फिरने के लिए कितनी जगह बची है।
विशेषज्ञों का साफ़ मानना है कि बाघों की बढ़ती आबादी के साथ साथ अब उनके रहने के लिए पर्याप्त और सुरक्षित जगह का सवाल भी उतना ही अहम हो गया है, क्योंकि बहुत सीमित इलाकों में जरूरत से ज़्यादा बाघों का होना आगे चलकर कई तरह की नई मुश्किलें भी खड़ी कर सकता है।
गलियारों का महत्व
बाघों के लंबे और पूरी तरह सुरक्षित भविष्य के लिए जंगलों को आपस में जोड़ने वाले प्राकृतिक गलियारों की भूमिका बेहद अहम मानी जाती है, क्योंकि इन्हीं रास्तों के ज़रिए बाघ एक जंगल से दूसरे जंगल तक सुरक्षित रूप से आ जा सकते हैं और धीरे धीरे अपना दायरा भी बढ़ा सकते हैं।
यदि ये गलियारे सड़कों, खेतों या फिर बस्तियों के कारण बीच में कहीं टूट जाते हैं तो अलग अलग जंगलों में रहने वाले बाघों के झुंड एक दूसरे से पूरी तरह कट जाते हैं, जिससे उनकी आनुवंशिक विविधता और लंबे समय तक स्वस्थ बने रहने की क्षमता पर बहुत गहरा असर पड़ सकता है।
संरक्षण की सफलता की कहानी
बाघों को बचाने की भारत की यह पूरी यात्रा आज दुनिया भर के लिए एक बेहद प्रेरणादायक मिसाल बन चुकी है, क्योंकि कई दशक पहले जब इनकी संख्या तेज़ी से घट रही थी, तब देश ने एक विशेष योजना शुरू करके इन्हें बचाने का बीड़ा उठाया और उसके लिए कई विशेष अभयारण्य भी बनाए।
देश के अलग अलग राज्यों में दूर दूर तक फैले इन तमाम बाघ अभयारण्यों ने इस राजसी जानवर को एक सुरक्षित ठिकाना देने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई है, और आज इन्हीं संरक्षित इलाकों की बदौलत जंगलों में बाघों की दहाड़ एक बार फिर से पूरे आत्मविश्वास के साथ सुनाई देने लगी है।
आगे की चुनौतियाँ
बेशक भारत ने बाघों को बचाने में बहुत उल्लेखनीय सफलता हासिल की है, लेकिन इसका यह मतलब बिल्कुल भी नहीं है कि अब सारी चुनौतियाँ पूरी तरह खत्म हो चुकी हैं, क्योंकि आज भी इस जानवर के सामने कई तरह के गंभीर खतरे लगातार बने हुए हैं जिन्हें किसी भी हाल में अनदेखा नहीं किया जा सकता।
जंगलों का लगातार सिकुड़ना, अवैध शिकार और इंसानों के साथ बढ़ता हुआ टकराव आज भी बाघों के लिए सबसे बड़ी चिंताएँ बनी हुई हैं, इसीलिए विशेषज्ञ बार बार इस बात पर ज़ोर देते हैं कि इन शानदार जानवरों की रक्षा के लिए किए जा रहे प्रयास आगे भी उसी मज़बूती के साथ जारी रहने चाहिए।
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