12 इकाइयों को मंजूरी, धोलेरा में पहला फैब और साढ़े तेरह अरब डॉलर का दूसरा चरण। जानिए कैसे भारत खुद को वैश्विक चिप निर्माण का केंद्र बनाने की दिशा में तेजी से बढ़ रहा है।
भारत लंबे समय से इलेक्ट्रॉनिक्स का एक बड़ा उपभोक्ता रहा है, लेकिन अब देश सिर्फ चिप खरीदने के बजाय उन्हें अपनी धरती पर बनाने की महत्वाकांक्षा पाल रहा है। सेमीकंडक्टर मिशन के तहत हो रही तेज प्रगति इसी बदलाव का संकेत है। यह केवल एक औद्योगिक परियोजना नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता और तकनीकी संप्रभुता की दिशा में उठाया गया एक रणनीतिक कदम है।
सेमीकॉन इंडिया 2026
इस महत्वाकांक्षा का सबसे बड़ा मंच हाल ही में सामने आया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नई दिल्ली के यशोभूमि में सेमीकॉन इंडिया 2026 के पांचवें संस्करण का उद्घाटन किया। इस आयोजन में देश के बढ़ते सेमीकंडक्टर पारिस्थितिकी तंत्र को प्रदर्शित किया गया और मिशन के अगले चरण की रूपरेखा प्रस्तुत की गई, जिसने वैश्विक उद्योग का ध्यान अपनी ओर खींचा।
बारह इकाइयों को मंजूरी

आंकड़े इस प्रगति की गवाही देते हैं। जुलाई 2026 तक कुल बारह विनिर्माण इकाइयों को मंजूरी दी जा चुकी है, जिनमें संयुक्त रूप से 1.64 लाख करोड़ रुपये से अधिक का निवेश शामिल है। इनमें एक सिलिकॉन फैब, एक कंपाउंड सेमीकंडक्टर फैब और नौ पैकेजिंग इकाइयां हैं, जो उपभोक्ता उपकरण, ऑटोमोबाइल, दूरसंचार और एयरोस्पेस जैसे क्षेत्रों की जरूरतें पूरी करेंगी।
सेमीकॉन 2.0
मिशन अब अपने दूसरे चरण में प्रवेश कर रहा है। प्रधानमंत्री ने सेमीकंडक्टर मिशन के साढ़े तेरह अरब डॉलर के दूसरे चरण की घोषणा की, जिसे सेमीकॉन 2.0 नाम दिया गया है और जिसे जुलाई 2026 में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 1,27,500 करोड़ रुपये के परिव्यय के साथ मंजूरी दी। इस चरण में उपकरण निर्माण, सामग्री आपूर्ति श्रृंखला और स्वदेशी चिप डिजाइन पर जोर दिया जाएगा।
उत्पादन शुरू
योजनाएं अब कागज से निकलकर हकीकत बनने लगी हैं। रिपोर्टों के अनुसार, अब तक पांच इकाइयों ने व्यावसायिक उत्पादन शुरू कर दिया है। इसके साथ ही यह पारिस्थितिकी तंत्र चिप डिजाइन, विनिर्माण, पैकेजिंग, कच्चे माल और प्रतिभा विकास जैसे कई मोर्चों पर एक साथ विस्तार कर रहा है, जो एक परिपक्व होते उद्योग की निशानी है।
धोलेरा का पहला फैब
पूरे मिशन की सबसे प्रतीक्षित परियोजना गुजरात के धोलेरा में स्थित है। टाटा सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग द्वारा बनाई जा रही देश की पहली व्यावसायिक विनिर्माण इकाई से 2028 तक चिप उत्पादन शुरू होने की उम्मीद है। इस संयंत्र की क्षमता प्रति माह पचास हजार वेफर स्टार्ट बताई जा रही है, जो भारत के लिए एक बड़ी उपलब्धि होगी।
दस फैब का लक्ष्य
सरकार की महत्वाकांक्षा यहीं नहीं रुकती। भारत सेमीकंडक्टर मिशन के प्रमुख के अनुसार, देश दस फैब स्थापित करने की आकांक्षा रखता है। इस दिशा में एक और कदम बढ़ाते हुए उत्तर प्रदेश के जेवर में एक नए संयंत्र की घोषणा भी की गई है। इस तरह विनिर्माण को केवल एक राज्य तक सीमित न रखकर देश के विभिन्न हिस्सों में फैलाने का प्रयास किया जा रहा है।
तेजी से बढ़ता बाजार
इन प्रयासों के पीछे एक विशाल बाजार की संभावना छिपी है। अनुमानों के अनुसार, भारत का सेमीकंडक्टर विनिर्माण बाजार 2025 के लगभग 59.78 अरब डॉलर से बढ़कर 2035 तक 161.40 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। इतनी बड़ी वृद्धि की संभावना ही वैश्विक कंपनियों और निवेशकों को भारत की ओर आकर्षित कर रही है, जो इस क्षेत्र में नए अवसर तलाश रहे हैं।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता और इलेक्ट्रॉनिक्स से जुड़ाव
यह मिशन देश की व्यापक तकनीकी रणनीति का हिस्सा है। चिप निर्माण का सीधा संबंध कृत्रिम बुद्धिमत्ता और इलेक्ट्रॉनिक्स से है, जहां भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है। देश राष्ट्रीय स्तर पर पैंतालीस हजार से अधिक जीपीयू वाला कंप्यूट ढांचा तैयार कर रहा है, जबकि इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण का मूल्य लगभग 13 लाख करोड़ रुपये आंका गया है।
सेमीकंडक्टर पर यह जोर रणनीतिक दृष्टि से बेहद अहम है। आज लगभग हर आधुनिक उपकरण, कार से लेकर स्मार्टफोन और रक्षा प्रणालियों तक, चिप पर निर्भर करता है। इनका घरेलू उत्पादन न केवल आयात पर निर्भरता घटाता है, बल्कि आपूर्ति श्रृंखला में आने वाले झटकों से भी देश को सुरक्षित रखता है और उच्च कौशल वाली नौकरियां पैदा करता है।
आगे की चुनौतियां
हालांकि रास्ता आसान नहीं है। सेमीकंडक्टर निर्माण बेहद जटिल, पूंजी-गहन और तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण है। इसके लिए अत्यधिक कुशल प्रतिभा, स्थिर बुनियादी ढांचे और एक मजबूत आपूर्ति श्रृंखला की आवश्यकता होती है। असली परीक्षा इस बात में होगी कि भारत घोषित परियोजनाओं को समय पर और गुणवत्ता के साथ धरातल पर उतार पाता है या नहीं।
कुल मिलाकर, 2026 का यह घटनाक्रम भारत की तकनीकी यात्रा में एक निर्णायक मोड़ की ओर इशारा करता है। मजबूत निवेश, स्पष्ट लक्ष्य और चरणबद्ध योजना मिलकर एक ठोस नींव रख रहे हैं। यदि यह गति बनी रही, तो भारत आने वाले वर्षों में वैश्विक सेमीकंडक्टर मानचित्र पर एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी के रूप में उभर सकता है।

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