दिल्ली में सत्रह से उन्नीस सितंबर तक सेमीकॉन इंडिया 2026 का आयोजन हो रहा है, जबकि देश में चिप का व्यावसायिक उत्पादन शुरू हो चुका है और धोलेरा में पहली विनिर्माण इकाई तैयार हो रही है।
भारत तेजी से सेमीकंडक्टर यानी चिप बनाने के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाने की ओर बढ़ रहा है। कभी पूरी तरह आयात पर निर्भर रहने वाला यह क्षेत्र अब देश के भीतर ही उत्पादन की दिशा में ठोस कदम उठा रहा है, जिससे तकनीकी आत्मनिर्भरता की नई उम्मीद जगी है।
चिप आज हर आधुनिक उपकरण का दिल मानी जाती है, फिर चाहे वह मोबाइल फोन हो, कार हो या फिर कोई घरेलू उपकरण। ऐसे में इनका उत्पादन देश में ही होना न केवल आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण है, बल्कि रणनीतिक दृष्टि से भी बेहद अहम माना जा रहा है।
दिल्ली में सेमीकॉन 2026

इस बढ़ते महत्व की झलक राजधानी दिल्ली में आयोजित हो रहे बड़े आयोजन में साफ दिखाई देती है। सत्रह से उन्नीस सितंबर दो हजार छब्बीस तक चलने वाला सेमीकॉन इंडिया इस क्षेत्र का दक्षिण एशिया का सबसे बड़ा आयोजन माना जा रहा है।
इस बार आयोजन में पाँच सौ से अधिक कंपनियाँ हिस्सा ले रही हैं, जिनमें दो सौ चालीस से ज्यादा अंतरराष्ट्रीय कंपनियाँ शामिल हैं। पिछले वर्ष यह संख्या लगभग साढ़े तीन सौ थी, जिससे पता चलता है कि इस क्षेत्र में रुचि कितनी तेजी से बढ़ी है।
मेड इन इंडिया चिप की शुरुआत
भारत के लिए सबसे उत्साहजनक बात यह है कि देश में चिप का व्यावसायिक उत्पादन अब केवल घोषणा नहीं, बल्कि हकीकत बन चुका है। कई इकाइयाँ पहले से ही चिप की असेंबली, पैकेजिंग और परीक्षण का काम शुरू कर चुकी हैं।
गुजरात के साणंद में माइक्रोन की इकाई मेमोरी चिप की असेंबली, परीक्षण और पैकेजिंग कर रही है। इसके साथ ही असम के जागीरोड में टाटा की इकाई और साणंद में सीजी पावर की इकाई भी उत्पादन की दिशा में सक्रिय रूप से आगे बढ़ रही हैं।
पहला वाणिज्यिक फैब
पैकेजिंग और परीक्षण से आगे बढ़कर भारत अब चिप की वास्तविक विनिर्माण इकाई यानी फैब की ओर भी कदम रख रहा है। गुजरात के धोलेरा में टाटा की ओर से देश की पहली व्यावसायिक चिप विनिर्माण इकाई तैयार की जा रही है।
रिपोर्टों के अनुसार, इस इकाई से चिप का उत्पादन दो हजार अट्ठाईस तक शुरू होने की उम्मीद है। इसकी क्षमता प्रति माह लगभग पचास हजार वेफर तैयार करने की बताई जा रही है, जो भारत के लिए एक बड़ी तकनीकी उपलब्धि साबित हो सकती है।
सरकार का सेमीकंडक्टर मिशन
इस पूरे प्रयास के पीछे सरकार की सुनियोजित नीति है। वर्ष दो हजार इक्कीस में शुरू किए गए भारत सेमीकंडक्टर मिशन के जरिए इस क्षेत्र की नींव रखी गई थी, और अब इसका अगला चरण भी शुरू किया जा रहा है।
हाल के केंद्रीय बजट में इस मिशन के दूसरे चरण के लिए एक हजार करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। दिसंबर दो हजार पच्चीस तक इस क्षेत्र में दस परियोजनाओं को मंजूरी मिल चुकी थी, जिनमें कुल मिलाकर करीब एक दशमलव छह लाख करोड़ रुपये का निवेश शामिल है।
बाजार की बड़ी संभावना
भारत में चिप की माँग तेजी से बढ़ रही है। अनुमानों के अनुसार, यह माँग हर साल करीब उन्नीस प्रतिशत की दर से बढ़ रही है, जो इस क्षेत्र की विशाल संभावनाओं की ओर स्पष्ट संकेत करती है और निवेशकों को आकर्षित कर रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि दो हजार तीस तक देश में चिप की माँग करीब नब्बे अरब डॉलर और दो हजार पैंतीस तक लगभग दो सौ अरब डॉलर तक पहुँच सकती है। फिलहाल भारत अपनी जरूरत की करीब पंचानबे प्रतिशत चिप आयात करता है।
आगे की राह
इन आँकड़ों से साफ है कि घरेलू उत्पादन बढ़ाने की कितनी बड़ी जरूरत है। यदि भारत अपनी क्षमता का विस्तार करने में सफल होता है, तो यह न केवल आयात पर निर्भरता घटाएगा, बल्कि रोजगार और नई तकनीकों के विकास को भी बढ़ावा देगा।
हालांकि यह राह आसान नहीं है, क्योंकि चिप निर्माण अत्यधिक जटिल और खर्चीली प्रक्रिया है। फिर भी लगातार हो रहे निवेश और स्पष्ट सरकारी नीति के साथ भारत इस क्षेत्र में एक भरोसेमंद वैश्विक भागीदार बनने की दिशा में मजबूती से आगे बढ़ रहा है।
सेमीकंडक्टर के बारे में अच्छा संदर्भ.

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