साल २०२६ भारत के सेमीकंडक्टर मिशन के लिए ऐतिहासिक साबित हो रहा है। गुजरात के ढोलेरा और साणंद में लगे संयंत्रों के साथ देश अब चिप निर्माण के वैश्विक नक्शे पर अपनी जगह बना रहा है।
लंबे समय तक भारत तकनीक की दुनिया में एक बड़ा उपभोक्ता बाज़ार रहा है, लेकिन चिप जैसे अहम कल-पुर्ज़ों के लिए उसे हमेशा दूसरे देशों पर निर्भर रहना पड़ा है। अब यह तस्वीर तेज़ी से बदल रही है, क्योंकि साल २०२६ में देश अपने महत्वाकांक्षी सेमीकंडक्टर मिशन के तहत ठोस नतीजे देने लगा है।
सेमीकंडक्टर या चिप आज के दौर में लगभग हर इलेक्ट्रॉनिक उपकरण का दिल माने जाते हैं। मोबाइल फोन से लेकर कार, कंप्यूटर और घरेलू उपकरणों तक, हर जगह इनकी ज़रूरत पड़ती है। यही वजह है कि इनका घरेलू स्तर पर निर्माण भारत के लिए रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
नीति से हकीकत तक
जानकारों के अनुसार, साल २०२६ में भारत का सेमीकंडक्टर सपना महज़ एक नीति दस्तावेज़ से आगे बढ़कर अब निर्माणाधीन कारखानों और चालू संयंत्रों की शक्ल ले चुका है। यह बदलाव देश की तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा और ठोस कदम माना जा रहा है, जिसकी चर्चा इस समय हर ओर हो रही है।
इस पूरे अभियान का केंद्र इस समय पश्चिमी राज्य गुजरात बना हुआ है। यहाँ के दो प्रमुख स्थानों, ढोलेरा और साणंद में लगने वाले संयंत्र इस मिशन की रीढ़ की हड्डी की तरह हैं। इन दोनों परियोजनाओं पर पूरे देश और यहाँ तक कि वैश्विक तकनीकी जगत की भी काफ़ी पैनी नज़र बनी हुई है।
ढोलेरा में पहला सिलिकॉन
ढोलेरा में टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स और ताइवान की कंपनी पावरचिप के साझा प्रयास से देश का पहला बड़ा चिप निर्माण संयंत्र आकार ले रहा है। रिपोर्टों के मुताबिक, इस कारखाने से पहला सिलिकॉन, यानी उत्पादन लाइन पर तैयार होने वाला पहला वेफर, साल २०२६ के अंत तक सामने आने की उम्मीद जताई जा रही है।
यह संयंत्र शुरुआत में परिपक्व तकनीक पर आधारित चिप बनाने पर ध्यान देगा, जिनका आकार लगभग २८ नैनोमीटर से ९० नैनोमीटर के बीच होगा। इन चिपों का इस्तेमाल मुख्य रूप से वाहनों, औद्योगिक नियंत्रकों, डिस्प्ले ड्राइवरों और बिजली प्रबंधन जैसे व्यापक क्षेत्रों में किए जाने की योजना बनाई गई है।
साणंद में मेमोरी चिप
दूसरी ओर साणंद में अमेरिकी कंपनी माइक्रोन का संयंत्र इस मिशन की पहली चालू इकाई बन चुका है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीते २८ फरवरी २०२६ को इस अत्याधुनिक सुविधा का औपचारिक उद्घाटन किया, जिसे मौजूदा अभियान चक्र की एक बड़ी उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है।
यह संयंत्र मुख्य रूप से चिपों की असेंबली, परीक्षण और पैकेजिंग का काम करता है। यहाँ मोबाइल उपकरणों, डेटा केंद्रों और वाहनों में इस्तेमाल होने वाली डीरैम तथा नैंड फ्लैश मेमोरी चिपों को तैयार किया जाता है। इस परियोजना के लिए सरकार की ओर से करीब ८२.५ करोड़ डॉलर की प्रोत्साहन राशि दी गई है।
सरकार का बड़ा दांव
भारत सरकार इस पूरे क्षेत्र को लेकर बेहद गंभीर नज़र आ रही है और इसके लिए भारी-भरकम बजट भी आवंटित कर रही है। सेमीकंडक्टर मिशन के दूसरे चरण के तहत वित्त वर्ष २०२६-२७ के लिए करीब ८,००० करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है, जिसे अब तक का सबसे बड़ा वार्षिक आवंटन बताया जा रहा है।
सरकार की ओर से इस क्षेत्र की भविष्य की योजना को लेकर भी स्पष्ट रूपरेखा सामने रखी गई है। केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव के अनुसार, साल २०२६ के अंत तक चार संयंत्र चालू हो जाएँगे, दो और संयंत्र २०२७ में तैयार होंगे, जबकि देश की पहली पूर्ण फैब्रिकेशन इकाई ढोलेरा में २०२८ तक बनकर तैयार हो जाएगी।
डिजाइन में भी भारत आगे

चिप निर्माण के साथ-साथ भारत उनके डिज़ाइन के क्षेत्र में भी अपनी क्षमता लगातार साबित कर रहा है। हाल ही में एक बड़ी कंपनी क्वालकॉम ने अत्यंत उन्नत २ नैनोमीटर की चिप का टेप-आउट पूरा किया, जिसके डिज़ाइन का काफ़ी हिस्सा बेंगलुरु, चेन्नई और हैदराबाद के इंजीनियरिंग केंद्रों में तैयार हुआ।
हालाँकि इस चिप का वास्तविक निर्माण ताइवान की मशहूर कंपनी टीएसएमसी के कारखाने में किया जाएगा, फिर भी इसके डिज़ाइन में भारतीय इंजीनियरों की अहम भूमिका देश की बढ़ती तकनीकी विशेषज्ञता को साफ़ तौर पर रेखांकित करती है। यह दर्शाता है कि भारत सिर्फ़ निर्माण ही नहीं, बल्कि नवाचार में भी पीछे नहीं है।
आगे की राह
कुल मिलाकर देखा जाए तो साल २०२६ भारत के सेमीकंडक्टर सफ़र में एक निर्णायक मोड़ के रूप में दर्ज हो रहा है। नीति से निकलकर ज़मीनी हकीकत बनने तक का यह सफ़र आसान नहीं रहा, लेकिन आने वाले वर्षों में यह देश की अर्थव्यवस्था और तकनीकी आत्मनिर्भरता को नई ऊँचाइयों तक ले जाने की क्षमता ज़रूर रखता है।
सेमीकंडक्टर के बारे में अच्छा संदर्भ.
सच.

Keep following अर्जुन मेहताHer next filing reaches you the moment it publishes, on her own subdomain.
Follow