राष्ट्रीय ड्रोन सम्मेलन 2026 में शुरू हुए तीन बड़े अभियानों से भारत गांवों में दो लाख ड्रोन उद्यमी तैयार करने और 75 उन्नत कौशल केंद्र खोलने की ओर बढ़ रहा है, जिससे खेती और ग्रामीण रोजगार दोनों बदल सकते हैं।
कुछ साल पहले तक भारत के गांवों में ड्रोन का मतलब सिर्फ शादी-ब्याह की तस्वीरें खींचने वाला एक शौकिया उपकरण भर था। लेकिन अब यही तकनीक खेती, रोजगार और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा देने वाली एक गंभीर ताकत के रूप में उभरती दिख रही है।
इस बदलाव को और मजबूती तब मिली जब राष्ट्रीय ड्रोन सम्मेलन 2026 के मंच से एक साथ तीन बड़े राष्ट्रीय अभियानों की शुरुआत की गई। रिपोर्ट के अनुसार यह आयोजन इसी वर्ष सात जुलाई को नई दिल्ली में हुआ, जिसकी विषयवस्तु रखी गई थी नीति से समृद्धि तक।
एक सहकारी मंच पर पूरा उद्योग
पहली बड़ी पहल के तौर पर एक बहु-राज्य सहकारी समिति बनाई गई, जिसे बहु-राज्य सहकारी समिति अधिनियम 2002 के तहत गठित किया गया है। इसका मकसद ड्रोन निर्माताओं, पायलटों, प्रशिक्षण संस्थानों, स्टार्टअप और किसानों को एक ही साझा मंच पर लाना है।
यह मॉडल इसलिए अहम है क्योंकि अब तक ड्रोन से जुड़ी गतिविधियां बिखरी हुई थीं। सहकारी ढांचे में आने से छोटे उद्यमियों और किसानों को बेहतर सौदेबाजी, साझा संसाधन और तकनीकी मदद मिलने की उम्मीद है, जिससे पूरा क्षेत्र अधिक संगठित रूप ले सकता है।
दो लाख गांवों में उद्यमिता

दूसरी और सबसे महत्वाकांक्षी पहल है एक पंचायत, एक ड्रोन उद्यमी नामक राष्ट्रीय मिशन। रिपोर्ट के अनुसार इसका लक्ष्य आने वाले पांच वर्षों में देश की दो लाख कृषि आधारित पंचायतों में दो लाख ड्रोन उद्यमी तैयार करना है, ताकि गांवों में ही नए अवसर पैदा हों।
इस मिशन का सीधा जोर ग्रामीण रोजगार, युवाओं के सशक्तिकरण और खेती की उत्पादकता बढ़ाने पर है। जब हर पंचायत में कोई प्रशिक्षित ड्रोन उद्यमी होगा, तो छिड़काव, बीज बोने और फसल की निगरानी जैसे काम तेज, सस्ते और अधिक सटीक हो सकते हैं।
खेती के लिहाज से यह बदलाव खासा मायने रखता है। पारंपरिक तरीके से जिस काम में घंटों और कई मजदूर लगते थे, वही काम ड्रोन की मदद से कम समय और कम लागत में पूरा किया जा सकता है, जिससे छोटे और मझोले किसानों को सबसे ज्यादा फायदा पहुंच सकता है।
कौशल केंद्रों से तैयार होगी नई पीढ़ी
तीसरी पहल के तहत देशभर में पचहत्तर उन्नत कौशल केंद्र स्थापित करने की घोषणा की गई। इन केंद्रों में ड्रोन तकनीक के साथ-साथ रोबोटिक्स, जीआईएस और सुदूर संवेदन तथा इलेक्ट्रिक गतिशीलता जैसी उभरती तकनीकों का प्रशिक्षण दिया जाएगा।
रिपोर्ट के अनुसार ये कौशल केंद्र विश्वविद्यालयों, इंजीनियरिंग कॉलेजों, पॉलिटेक्निक और सरकारी औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों में खोले जाएंगे। इन्हें राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और स्किल इंडिया मिशन के अनुरूप तैयार किया गया है, ताकि युवाओं को भविष्य के लिए तैयार किया जा सके।
खेत से बाजार तक पूरी व्यवस्था
सम्मेलन में लगी प्रदर्शनी ने यह भी दिखाया कि ड्रोन का इस्तेमाल अब सिर्फ उड़ान तक सीमित नहीं है। वहां कृषि ड्रोन, मेड इन इंडिया विनिर्माण, ड्रोन-ऐज़-अ-सर्विस मॉडल, पायलट प्रशिक्षण और ड्रोन के लिए वित्तपोषण जैसे विभिन्न पहलुओं को एक साथ पेश किया गया।
इसके अलावा नागरिक उड्डयन महानिदेशालय से मान्यता प्राप्त प्रशिक्षण संगठनों के जरिए पायलट तैयार करने और एआई तथा जीआईएस आधारित मंचों पर भी जोर दिया गया। यह पूरी व्यवस्था खेत से लेकर बाजार तक एक जुड़ा हुआ तंत्र खड़ा करने की कोशिश दिखाती है।
आगे की राह और चुनौतियां
इस पूरे प्रयास को भारत के सहकारिता मंत्रालय की पांच वर्षों की यात्रा और सहकार से समृद्धि के विचार से जोड़कर देखा जा रहा है। इसे विकसित भारत 2047 के बड़े सपने की दिशा में एक कदम के रूप में भी प्रस्तुत किया गया है, जो दीर्घकालिक सोच को दर्शाता है।
हालांकि असली परीक्षा जमीन पर क्रियान्वयन की होगी। दो लाख उद्यमी तैयार करना, उन्हें प्रशिक्षण और वित्त उपलब्ध कराना और गांव-गांव तक इस तकनीक को टिकाऊ बनाना आसान नहीं है, लेकिन अगर यह मॉडल सफल रहा तो ग्रामीण भारत की तस्वीर सचमुच बदल सकती है।
ग्रामीण भारत का अच्छा विश्लेषण.
मैं भी यही सोचता हूँ.

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