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भारत की चिप यात्रा: 2026 में सेमीकंडक्टर मिशन कैसे आकार ले रहा है

अर्जुन मेहता अर्जुन मेहता arjunmehta.avalw.com · 4.6k reads Respect0 Save Share Read only
READS622live count PUBLISHED30 Aug2026 READING TIME2 min338 words LANGUAGEHindi
AI CITATIONS? Gathering data

2026 में भारत पहली बार अपनी ज़मीन पर चिप बनाने की ओर बढ़ रहा है,टाटा का ढोलेरा फैब, माइक्रोन की पैकेजिंग इकाई और 28 नैनोमीटर पर केंद्रित रणनीति। प्रगति और चुनौतियों पर एक संतुलित नज़र।

टाटा का ढोलेरा प्लांट

सबसे बड़ी उम्मीद गुजरात के ढोलेरा में टाटा और पीएसएमसी के संयुक्त कारखाने से जुड़ी है। यह देश का पहला वेफर फैब्रिकेशन प्लांट है, जिससे पहली सिलिकॉन चिप 2026 से 2027 के बीच आने की उम्मीद है। इसकी क्षमता हर महीने पचास हज़ार वेफर की होगी, यह 28 नैनोमीटर तकनीक पर केंद्रित रहेगा और इसमें करीब इक्कीस हज़ार लोगों को रोज़गार मिलने का अनुमान है।

माइक्रोन और पैकेजिंग

सिर्फ़ फैब्रिकेशन ही नहीं, असेंबली और टेस्टिंग में भी प्रगति हो रही है। माइक्रोन की करीब दो अरब पचहत्तर करोड़ डॉलर की इकाई ने 2025 के अंत में उत्पादन शुरू किया, जो वैश्विक बाज़ार के लिए डीरैम और नैंड मेमोरी चिप की असेंबली और जाँच करती है। गुजरात के साणंद में इसकी पैकेजिंग इकाई का उद्घाटन फरवरी 2026 में हुआ, जो इस मिशन चक्र की पहली चालू इकाई मानी जाती है।

और भी इकाइयाँ

यह तस्वीर एक कारखाने तक सीमित नहीं है। असम के जगीरोड में टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स की असेंबली और टेस्टिंग इकाई पहले से चालू है, जबकि साणंद में सीजी पावर की इकाई भी धीरे-धीरे शुरू हो रही है। कई राज्यों में फैली ये इकाइयाँ दिखाती हैं कि भारत एक पूरी आपूर्ति शृंखला खड़ी करने की कोशिश कर रहा है, न कि केवल एक अकेला संयंत्र।

28 नैनोमीटर का चुनाव

तकनीकी चुनाव भी सोच-समझकर किया गया लगता है। भारत सबसे उन्नत तीन नैनोमीटर चिप की दौड़ में नहीं उतर रहा, बल्कि 28 नैनोमीटर पर ध्यान दे रहा है। यह वह श्रेणी है जो कारों, औद्योगिक उपकरणों और उपभोक्ता आधारित उपकरणों के लिए सबसे उपयुक्त है। यानी भारत उन्हीं उत्पादों के लिए चिप बना रहा है, जिन्हें वह वास्तव में बड़ी संख्या में तैयार करता है।

मेरा संतुलित नज़रिया

इतनी प्रगति के बावजूद मैं अति-उत्साह से बचता हूँ। बड़े कारखाने अक्सर तय समय से देर से चालू होते हैं, और घोषित निवेश हमेशा उसी गति से हकीकत नहीं बनते। फिर भी दिशा मुझे स्वस्थ लगती है, क्योंकि भारत सिर्फ़ आयात पर निर्भर रहने के बजाय अपनी बुनियाद खड़ी कर रहा है। असली परीक्षा यह होगी कि ये कारखाने समय पर, टिकाऊ ढंग से और वैश्विक गुणवत्ता के साथ चल पाते हैं या नहीं।

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चिप: साफ और अच्छे से समझाया.

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अर्जुन मेहता 2026-08-30 · 2 min read · 622 reads
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