गुजरात के साणंद में माइक्रोन की चिप असेंबली इकाई शुरू, तो टाटा की धोलेरा फैब से पहला सिलिकॉन जल्द। भारत सेमीकंडक्टर मिशन के तहत देश कैसे अपने चिप बनाने की दिशा में तेज़ी से बढ़ रहा है, जानिए।
अपने ही देश में सेमीकंडक्टर चिप बनाने का भारत का बरसों पुराना सपना अब 2026 में ठोस आकार लेता दिख रहा है। कभी नीतिगत दस्तावेज़ों तक सीमित रहने वाली यह महत्वाकांक्षा अब गुजरात और असम जैसे राज्यों में असली कारख़ानों और उत्पादन इकाइयों की शक्ल में सामने आ रही है, जिसे तकनीकी क्षेत्र में एक बड़ा पड़ाव माना जा रहा है।
सेमीकंडक्टर आज हमारे जीवन के लगभग हर हिस्से में मौजूद हैं। स्मार्टफ़ोन से लेकर कारों, घरेलू उपकरणों और औद्योगिक मशीनों तक, हर जगह इन्हीं छोटी चिपों का इस्तेमाल होता है। लंबे समय तक भारत इन्हें बड़े पैमाने पर आयात करता रहा, लेकिन अब इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन के तहत यह तस्वीर तेज़ी से बदलती नज़र आ रही है।
साणंद में माइक्रोन की इकाई

रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिकी कंपनी माइक्रोन ने गुजरात के साणंद में सेमीकंडक्टर असेंबली, टेस्ट और पैकेजिंग यानी एटीएमपी इकाई स्थापित की है। इसका उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, माइक्रोन के प्रमुख संजय मेहरोत्रा, गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल और केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव की मौजूदगी में हुआ बताया गया है।
प्रकाशित जानकारी के मुताबिक़, इस परियोजना में माइक्रोन और सरकारी साझेदारों का मिलाकर कुल 2.75 अरब डॉलर का निवेश हुआ है। यह आँकड़ा दर्शाता है कि भारत में सेमीकंडक्टर विनिर्माण को लेकर कितनी बड़ी पूँजी और गंभीरता के साथ काम आगे बढ़ाया जा रहा है, जो पहले शायद ही कभी देखा गया था।
बताया गया है कि इस इकाई में शुरुआती चरण में ही पाँच लाख वर्ग फुट से अधिक का क्लीनरूम स्थान तैयार किया गया है। इसे भविष्य में दुनिया के सबसे बड़े सिंगल फ़्लोर असेंबली और टेस्ट क्लीनरूम में से एक बनाने की योजना है, और यहाँ व्यावसायिक उत्पादन भी शुरू हो चुका है।
करोड़ों चिप का उत्पादन
उत्पादन क्षमता की बात करें तो रिपोर्ट बताती है कि यह इकाई 2026 के दौरान करोड़ों की संख्या में सेमीकंडक्टर चिप की असेंबली और टेस्टिंग करेगी। इसके बाद 2027 में उत्पादन को और तेज़ करते हुए इसे कई गुना बढ़ाकर सैकड़ों मिलियन चिप तक ले जाने का लक्ष्य रखा गया है।
यह ध्यान देने योग्य है कि साणंद की इकाई मुख्य रूप से चिप की असेंबली, टेस्टिंग और पैकेजिंग का काम करती है, जो सेमीकंडक्टर आपूर्ति शृंखला का एक बेहद अहम हिस्सा है। इसके ज़रिए भारत वैश्विक चिप मूल्य शृंखला में एक ठोस स्थान बनाने की दिशा में क़दम बढ़ा रहा है।
टाटा की धोलेरा फैब
इस मिशन का दूसरा बड़ा स्तंभ टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स है। रिपोर्ट्स के अनुसार, कंपनी गुजरात के धोलेरा में ताइवान की पावरचिप यानी पीएसएमसी के सहयोग से एक ग्रीनफ़ील्ड वेफ़र फैब्रिकेशन इकाई बना रही है, जहाँ से पहला सिलिकॉन 2026 से 2027 के बीच आने की उम्मीद जताई जा रही है।
बताया गया है कि यह फैब मुख्य रूप से 28 नैनोमीटर और उससे बड़े, यानी मैच्योर नोड वाले चिप बनाएगी, न कि सबसे उन्नत पाँच नैनोमीटर से नीचे वाले। इन चिपों का इस्तेमाल मुख्य रूप से ऑटोमोटिव, औद्योगिक और कंज़्यूमर इंटरनेट ऑफ़ थिंग्स जैसे व्यावहारिक क्षेत्रों में होने की संभावना है।
असम में टाटा की इकाई
टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स की गतिविधियाँ सिर्फ़ गुजरात तक सीमित नहीं हैं। प्रकाशित जानकारी के मुताबिक़, कंपनी की असम के जगीरोड में स्थित सेमीकंडक्टर असेंबली और टेस्ट इकाई पहले से ही चालू है, जिससे देश में चिप विनिर्माण का दायरा एक से अधिक राज्यों तक फैलता हुआ दिखाई दे रहा है।
नीति से कारख़ाने तक
इन सभी घटनाक्रमों को एक साथ देखें तो एक स्पष्ट तस्वीर उभरती है। रिपोर्ट के शब्दों में, भारत की सेमीकंडक्टर महत्वाकांक्षा 2026 में एक नीतिगत दस्तावेज़ से आगे बढ़कर निर्माणाधीन स्थल और फिर एक चालू उत्पादन इकाई तक पहुँच चुकी है, जो अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।
मैच्योर नोड चिप पर ध्यान केंद्रित करने का एक व्यावहारिक पहलू भी है। ऑटोमोबाइल और औद्योगिक उपकरणों में इसी तरह की चिप की भारी माँग रहती है, इसलिए इस क्षेत्र में उत्पादन शुरू करना भारत के लिए वैश्विक आपूर्ति शृंखला में जगह बनाने की एक व्यावहारिक शुरुआत हो सकती है।
आगे की राह
फ़िलहाल यह कहना जल्दबाज़ी होगी कि भारत कितनी तेज़ी से सबसे उन्नत चिप तकनीक तक पहुँच पाएगा। लेकिन इतना ज़रूर है कि आयात पर निर्भरता से घटकर अपने देश में चिप बनाने की दिशा में यह बदलाव अब साफ़ तौर पर शुरू हो चुका है, और आने वाले वर्षों में इसकी रफ़्तार पर सबकी नज़र बनी रहेगी।
भारत के बारे में बहुत उपयोगी लेख.
भारत पर बहुत अच्छी कवरेज.

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