पांच साल पहले तक जो निर्यात लगभग शून्य था, आज वही भारत का सबसे बड़ा ब्रांडेड निर्यात बन चुका है। स्मार्टफोन निर्माण में भारत ने ऐसी छलांग लगाई है कि आईफोन का निर्यात रिकॉर्ड 2 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। हम इस पूरी कहानी को शांति से समझते हैं, केवल सार्वजनिक स्रोतों के आधार पर।
कुछ ही साल पहले तक भारत को स्मार्टफोन बनाने वाला देश नहीं, बल्कि खरीदने वाला देश माना जाता था। लेकिन आज तस्वीर पूरी तरह बदल गई है, क्योंकि भारत अब चुपचाप दुनिया के सबसे बड़े स्मार्टफोन कारखानों में से एक बनता जा रहा है। खासकर आईफोन का निर्माण और उसका निर्यात इस बदलाव की सबसे चमकदार मिसाल बनकर उभरा है।
इस लेख में हम शांति से समझने की कोशिश करेंगे कि यह छलांग आखिर कितनी बड़ी है, इसके पीछे कौन सी नीति काम कर रही है और आगे का रास्ता कैसा दिखता है। यहां दिया गया हर आंकड़ा और हर दावा केवल सार्वजनिक रूप से उपलब्ध स्रोतों पर आधारित है, हमारी ओर से किसी भी तरह के अनुमान या अतिशयोक्ति के बिना।
रिकॉर्ड तोड़ निर्यात
सबसे पहले बात करते हैं आंकड़ों की, जो सचमुच हैरान करने वाले हैं। सार्वजनिक स्रोतों के अनुसार, वित्त वर्ष 2026 में भारत से आईफोन का निर्यात रिकॉर्ड 2 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया। इतना ही नहीं, इसी अवधि में देश का कुल स्मार्टफोन निर्यात करीब 2.6 लाख करोड़ रुपये, यानी लगभग 29.4 अरब डॉलर के आसपास दर्ज किया गया।
भारत का सबसे बड़ा ब्रांडेड निर्यात

इन आंकड़ों का असली महत्व तब समझ आता है जब हम इनकी तुलना दूसरी चीजों से करते हैं। सार्वजनिक स्रोतों के अनुसार, आईफोन अब भारत का अकेला सबसे बड़ा ब्रांडेड निर्यात बन चुका है। यह उपलब्धि वैश्विक व्यापार में इस्तेमाल होने वाली उन सभी हजारों उत्पाद श्रेणियों को पीछे छोड़ते हुए हासिल की गई है, जो अपने आप में एक बड़ी बात है।
पीएलआई योजना का जादू
यह सब अपने आप नहीं हुआ, बल्कि इसके पीछे एक सोची समझी नीति है। सार्वजनिक स्रोतों के अनुसार, उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन यानी पीएलआई योजना के दम पर आईफोन का निर्यात पांच साल में लगभग शून्य से बढ़कर 2 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचा। इन पांच वर्षों में एप्पल ने भारत में करीब 70 अरब डॉलर के फोन बनाए, जिनमें से लगभग 51 अरब डॉलर के फोन निर्यात हुए।
वैश्विक असेंबली में बड़ी हिस्सेदारी
भारत की यह भूमिका अब वैश्विक स्तर पर भी साफ दिखाई देने लगी है। सार्वजनिक स्रोतों के अनुसार, अनुमान है कि साल 2026 में दुनिया भर में होने वाली आईफोन असेंबली में भारत की हिस्सेदारी करीब 28 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। यह आंकड़ा बताता है कि भारत अब इस क्षेत्र में सिर्फ एक छोटा खिलाड़ी नहीं, बल्कि एक अहम केंद्र बन चुका है।
सिर्फ एप्पल नहीं, पूरा इकोसिस्टम
इस सफलता को सिर्फ एक कंपनी की कहानी समझना भूल होगी। सार्वजनिक स्रोतों के अनुसार, इसके पीछे एक पूरा तंत्र खड़ा हुआ है, जिसमें 40 से ज्यादा घरेलू कंपनियां शामिल हैं। इनके साथ जापान की टीडीके और ताइवान की कई साझेदार कंपनियों जैसे गैर-चीनी आपूर्तिकर्ता भी जुड़े, और कामगारों को विशेष प्रशिक्षण भी दिया गया।
अगला पड़ाव, नई योजना
यह कहानी यहीं नहीं रुकती, बल्कि भविष्य की तैयारी भी शुरू हो चुकी है। सार्वजनिक स्रोतों के अनुसार, सरकार एक नई मोबाइल फोन विनिर्माण योजना लेकर आई है, जो वित्त वर्ष 2026-27 से 2030-31 तक यानी पांच साल चलेगी। इस योजना से आने वाले वर्षों में करीब 60,000 प्रत्यक्ष रोजगार पैदा होने की उम्मीद जताई गई है।
यह क्यों मायने रखता है
आंकड़ों से परे, इस पूरे घटनाक्रम का असर आम आदमी की जिंदगी तक पहुंचता है। एक ओर यह लाखों लोगों के लिए रोजगार के नए दरवाजे खोलता है, तो दूसरी ओर देश में मूल्यवान विदेशी मुद्रा लेकर आता है। सबसे बड़ी बात यह है कि जो देश कभी सिर्फ फोन आयात करता था, वह अब उन्हें बनाकर दुनिया को बेच रहा है।
एक बड़े परिप्रेक्ष्य में देखें तो यह वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में हो रहे बदलाव की भी झलक है। कंपनियां अब अपने उत्पादन को किसी एक ही देश पर निर्भर रखने के बजाय दूसरे विकल्प तलाश रही हैं, और इस दौड़ में भारत एक भरोसेमंद ठिकाने के रूप में तेजी से उभर रहा है। यह आत्मनिर्भरता की दिशा में भी एक अहम कदम माना जा रहा है।
चुनौतियां भी कम नहीं
हालांकि इस चमकती तस्वीर के पीछे कुछ गंभीर चुनौतियां भी छिपी हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अभी बहुत सारा काम मुख्य रूप से असेंबली यानी जोड़ने तक ही सीमित है, जबकि कई अहम कलपुर्जे अब भी आयात करने पड़ते हैं। असली मजबूती तभी आएगी जब भारत मूल्य शृंखला में और गहराई तक उतरकर इन कलपुर्जों को भी खुद बनाने लगेगा।
कुल मिलाकर, भारत की यह स्मार्टफोन यात्रा उम्मीद और सतर्कता, दोनों का एक दिलचस्प मिश्रण है। इसने साबित कर दिया है कि सही नीति और मजबूत इच्छाशक्ति के दम पर बड़े से बड़ा लक्ष्य भी हासिल किया जा सकता है। फिर भी, इस रफ्तार को टिकाऊ बनाने के लिए आगे लगातार मेहनत और दूरदर्शी योजना की जरूरत बनी रहेगी।
आने वाला समय ही बताएगा कि यह सफर आखिर किस मुकाम तक पहुंचता है। लेकिन इतना तय है कि मेड इन इंडिया फोन ने वैश्विक मंच पर भारत की एक नई पहचान गढ़ दी है, जिसे मिटाना अब आसान नहीं। यदि यही गति बनी रही, तो यह क्षेत्र देश की डिजिटल और औद्योगिक अर्थव्यवस्था का एक मजबूत स्तंभ बन सकता है।
स्मार्टफोन को फॉलो करता हूँ और यह मददगार है.
स्मार्टफोन के बारे में बहुत उपयोगी लेख.
स्मार्टफोन का अच्छा विश्लेषण.
बिल्कुल.

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