इंडियाएआई मिशन के तहत सरकार ने 20 स्वदेशी मॉडल को समर्थन देने का फैसला किया है। जानिए इस पहल का बजट, कंप्यूट ढांचा और विदेशी निर्भरता घटाने की रणनीति।
इंडियाएआई मिशन की बड़ी तस्वीर
इंडियाएआई मिशन भारत की सबसे बड़ी तकनीकी पहलों में से एक है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इसके लिए करीब 10,371.92 करोड़ रुपये यानी लगभग 1.25 अरब डॉलर का बजट पांच साल की अवधि के लिए तय किया गया है। यह मिशन सात प्रमुख स्तंभों पर टिका है, जिनमें कंप्यूट का ढांचा, डेटा प्लेटफॉर्म, आधारभूत मॉडल, एप्लिकेशन विकास, कौशल, स्टार्टअप फंडिंग और सुरक्षित तकनीक शामिल हैं।
बीस स्वदेशी मॉडल चुने गए
सितंबर 2026 का सबसे अहम घटनाक्रम यही रहा कि सरकार ने समर्थन के लिए 20 स्वदेशी कृत्रिम बुद्धिमत्ता मॉडलों के प्रस्तावों को चुना है। इनमें 12 बड़े भाषा मॉडल और 8 छोटे भाषा मॉडल शामिल हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, मिशन के तहत अब तक कुल 20 आधारभूत मॉडल तैयार किए जा चुके हैं, जिनमें से 5 को पहले ही आम इस्तेमाल के लिए जारी किया जा चुका है।
विदेशी निर्भरता घटाने की कोशिश
इस पूरी कवायद का मकसद बिल्कुल साफ है। केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव के अनुसार, सरकार विदेशी मंचों पर निर्भरता कम करने और स्थानीय स्तर पर विकसित विकल्पों को प्रोत्साहित करने की अपनी रणनीति में तेजी लाने की तैयारी कर रही है। यह आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बेहद स्पष्ट संकेत माना जा रहा है।
कंप्यूट का मजबूत ढांचा

किसी भी कृत्रिम बुद्धिमत्ता मॉडल को प्रशिक्षित करने के लिए भारी कंप्यूटिंग शक्ति की जरूरत होती है। इस मोर्चे पर भारत ने बड़ी प्रगति की है और देश में अब लगभग 62,000 जीपीयू तैनात किए जा चुके हैं। इसके साथ ही इंडिया एआई कंप्यूट पोर्टल शोधकर्ताओं को रियायती दरों पर इस कंप्यूटिंग शक्ति तक पहुंच देता है, ताकि नए नवाचार को गति मिल सके।
भारतीय भाषाओं के लिए बनी तकनीक
इस मिशन की एक खास बात इसका गहरा स्थानीय संदर्भ है। इसका लक्ष्य ऐसी प्रणालियां बनाना है जो भारत की विविध भाषाओं, उद्योगों और सार्वजनिक सेवाओं के अनुकूल हों। एक ऐसे देश में जहां दर्जनों भाषाएं बोली जाती हैं, विदेशी मॉडल अक्सर स्थानीय जरूरतों को पूरी तरह नहीं समझ पाते, इसलिए देसी मॉडलों की भूमिका और भी अहम हो जाती है।
स्टार्टअप को बढ़ावा
मिशन का एक बड़ा हिस्सा स्टार्टअप को सहारा देने पर केंद्रित है। सरकार चाहती है कि भारतीय स्टार्टअप न सिर्फ घरेलू बाजार में, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी प्रतिस्पर्धा कर सकें। फंडिंग और कंप्यूट तक आसान पहुंच देकर नीति निर्माता एक ऐसा माहौल बनाना चाहते हैं जिसमें नई कंपनियां तेजी से आगे बढ़ें और नए आर्थिक अवसर पैदा कर सकें।
सुरक्षित और जिम्मेदार तकनीक
तकनीक की रफ्तार के साथ उसकी जिम्मेदारी भी उतनी ही अहम है। मिशन के सात स्तंभों में सुरक्षित और भरोसेमंद कृत्रिम बुद्धिमत्ता को खास जगह दी गई है। इसका मतलब है कि नई प्रणालियों को विकसित करते समय पारदर्शिता, नैतिकता और लोगों के भरोसे का पूरा ध्यान रखा जाए, ताकि तकनीक का इस्तेमाल समाज के हित में हो, उसके खिलाफ नहीं।
वैश्विक मंच पर भारत
भारत इस क्षेत्र में अपनी बढ़ती भूमिका को दुनिया के सामने भी मजबूती से रख रहा है। इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 ने वैश्विक ध्यान आकर्षित किया, जिससे पहले कई पूर्व-कार्यक्रम आयोजित किए गए। जयपुर में हुए एक आयोजन में नवप्रवर्तकों, नीति निर्माताओं, स्टार्टअप, निवेशकों और शिक्षाविदों ने जलवायु और सतत विकास में तकनीक की भूमिका पर गहन चर्चा की।
यह पूरा घटनाक्रम सिर्फ एक तकनीकी उपलब्धि नहीं है, बल्कि इसके गहरे आर्थिक और रणनीतिक मायने भी हैं। अपनी तकनीक पर नियंत्रण रखने का मतलब है डेटा और अहम प्रणालियों पर बेहतर पकड़, साथ ही ऊंची तनख्वाह वाली नौकरियों और नए उद्योगों का सृजन। एक बड़ी अर्थव्यवस्था के लिए यह आत्मनिर्भरता भविष्य की एक मजबूत नींव रख सकती है।
आगे की चुनौतियां
हालांकि आगे का रास्ता आसान बिल्कुल नहीं है। दुनिया की दिग्गज कंपनियों से मुकाबला करना, पर्याप्त कुशल प्रतिभा जुटाना और महंगे कंप्यूट संसाधनों को लगातार बनाए रखना बड़ी चुनौतियां हैं। इन देसी मॉडलों की असली परीक्षा इस बात में होगी कि वे वास्तविक इस्तेमाल में कितने उपयोगी और भरोसेमंद साबित होते हैं, न कि सिर्फ घोषणाओं के स्तर पर।
फिर भी, 2026 का यह कदम भारत की तकनीकी यात्रा में एक अहम मोड़ नजर आता है। मजबूत बजट, तेजी से बढ़ता कंप्यूट ढांचा और स्वदेशी मॉडलों पर स्पष्ट जोर मिलकर एक आत्मविश्वास से भरी तस्वीर पेश करते हैं। अगर यही गति बनी रही, तो भारत आने वाले वर्षों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के वैश्विक नक्शे पर एक निर्णायक भूमिका निभा सकता है।

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